सूचना का अधिकार अधिनियम- 2005 : प्रावधान, महत्व एवं चुनौतियां

भारत एक लोकतांत्रिक देश है और कोई भी लोकतांत्रिक देश की प्रगति के लिए जन सहभागिता आवश्यक है। यह जन सहभागिता सूचना के अधिकार के माध्यम से प्राप्त की जा सकती है। जन सहभागिता के लिए आवश्यक है की सूचनाओं का पारदर्शी होना। तो आइए दोस्तों आज एक नए टॉपिक के साथ जानते हैं की सूचना का अधिकार क्या है, सूचना का अधिकार अधिनियम, और इसका आकलन।

सूचना का अधिकार कब लागू हुआ

सूचना का अधिकार अधिनियम 15 जून 2005 को राष्ट्रपति से अनुमति मिलने के उपरांत 12 अक्टूबर 2005 को जम्मू कश्मीर को छोड़कर समस्त भारत में लागू हो गया। लेकिन 31 अक्टूबर 2019 को जम्मू कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश बनते ही यह कानून जम्मू कश्मीर में भी लागू हो गया।

पहला RTI आवेदन पुणे के पुलिस स्टेशन में शाहिद रजा नाम के व्यक्ति द्वारा 12 अक्टूबर 2005 को ही डाला गया था। इस से पूर्व वर्ष 2002 में सूचना की स्वतंत्रता विधयेक (Freedom of Information) को पारित किया गया था परंतु कुछ कारणों से यह लागू नहीं हो पाया। सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के लागू होते ही इस कानून को रद्द कर दिया गया। सूचना का अधिकार भारत के संविधान के भाग 3 की धारा 19(1)A के अनुसार मौलिक अधिकार के रूप में भी दिया गया है।

सूचना के अधिकार का इतिहास

अंग्रेजों के भारत पर शासन के दौरान शासकीय गोपनीयता अधिनियम 1923 बनाया गया था।  इस कानून के अंतर्गत सरकार समस्त राजकीय सूचनाओं को गोपनीय रख सकती है। आजादी के पश्चात ना तो कोई नया कानून बनाया गया नहीं इसमें कोई संशोधन किया गया। इस अधिनियम की धारा 5 एवं 6 का लाभ उठाकर सरकार सभी जरुरी सूचनाएं जनता से छुपाती रही। विश्व में सर्वप्रथम सूचना का अधिकार कानून स्वीडन में 1766 में लागू हुआ था।

भारत में सूचना के अधिकार के बारे में चेतना सर्वप्रथम 1975 में उत्तर प्रदेश बनाम राज नारायण केस से जागी। सूचना का अधिकार आगे भी सुर्खियों में रहा। इंडियन एक्सप्रेस न्यूजपेपर बनाम भारत संघ 1985 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने टिप्पणी की नागरिकों को सरकार के संचालन संबंधी सूचनाओं के बारे में जानने का अधिकार है। इसके अतिरिक्त भी उच्चतम न्यायालय सूचना के अधिकार के संबंध में कई बार टिप्पणियां कर चुका है।

लेकिन भारत में सूचना के अधिकार के लिए एक सशक्त आंदोलन की आवश्यकता थी और यह नेतृत्व राजस्थान में अरुणा रॉय एवं निखिल डे के माध्यम से मिला। इनके द्वारा चलाया गया आंदोलन ‘हमारा पैसा हमारे हिसाब” ने सूचना  के अधिकार को ओर मजबूती प्रदान की। इन्होंने मजदूर किसान शक्ति संगठन का गठन किया। अंततः राजस्थान सरकार ने 26 जनवरी 2001 को सूचना का अधिकार पास कर दिया। सर्वप्रथम भारत में मई -1997 में तमिलनाडु राज्य ने सूचना का अधिकार कानून लागू किया था। विश्व भर में 28 सितंबर को सूचना की सार्वभौमिकता पहुंच दिवस मनाया जाता है। भारत में भी प्रतिवर्ष 12 अक्टूबर को सूचना का अधिकार दिवस मनाया जाता हैं।

सूचना का अधिकार क्या है एवं इसकी आवश्यकता

भारत गणराज्य का शिक्षित नागरिक सूचना की पारदर्शिता की अपेक्षा करता है जो भ्रष्टाचार रोकने एवं शासन को उनके कार्यों के लिए उत्तरदायी बनाने के लिए अनिवार्यतः बाध्य करता है। आवश्यक सूचनाओं के प्रकटन से अन्य लोकहित प्राप्त होंगे जिसमें सरकारों का दक्षता से संचालन संभव होगा, सीमित राज्य संसाधनों का अधिकतम उपयोग संभव हो पाएगा। अतः इन सभी उपबंधों की प्राप्ति के लिए व्यक्तियों को सूचना प्रदान करने की व्यवस्था की गई जिससे इच्छुक व्यक्ति आवश्यक सूचनाएं प्राप्त कर सके। इस अधिनियम की धारा -12 के तहत एक केंद्रीय सूचना आयोग का गठन का प्रावधान किया गया है जो की एक नियंत्रणकारी संगठन हैं। कुल मिलाकर सूचना का अधिकार सुशासन की अवधारणा को मजबूती प्रदान करता है।

सूचना से क्या अभिप्राय है

अधिनियम के अंतर्गत सूचना में  किसी भी इलेक्ट्रॉनिक रूप में धारित अभिलेख, दस्तावेज, ई -मेल, ज्ञापन, मत, सलाह, प्रेस विज्ञप्ति, परिपत्र, आदेश, लोगबुक, संविदा (Tender)  नमूने, (Samples)  कागजपत्र, मॉडल, आंकड़ों से संबंधित जानकारी सम्मिलित है। किसी प्राइवेट निकाय से संबंधित कोई सूचना जो किसी भी कानून द्वारा किसी लोक अधिकारी को आवश्यक है सूचना में शामिल होंगे। सूचना के अभिलेखों में कोई फाइल, कोई माइक्रोफिल्म, जेरोक्स कॉपी भी शामिल होंगे।

सूचना के अधिकार में अधिकार का क्या मतलब है

सूचना के अधिकार द्वारा सूचना जो किसी लोक प्राधिकारी के नियंत्रण में है, मांगे गए व्यक्ति को उपलब्ध करवाना है। सूचना प्रदान करने में  सम्मिलित है कृति, दस्तावेज, डॉक्यूमेंट, अभिलेख रिकॉर्ड का निरीक्षण  एवं रिकॉर्ड से संबंधित टिप्पणियां,  प्रमाणित प्रतिलिपि। अगर सूचना कंप्यूटर में भंडारित है तो किस इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सूचना प्राप्त करना सम्मिलित है व्यक्ति के अधिकार में आता हैं।

जानकारी/सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया

सूचना प्राप्त करने वाले व्यक्ति को सूचना प्राप्त करने के लिए केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी को लिखित या RTI ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से आवेदन करना होता है।  उसे आवेदन से संबंधित फीस का भुगतान भी करना होता है जो केंद्र सरकार द्वारा वर्तमान में ₹10 निर्धारित की गई है। राज्य सरकार द्वारा इसमें कुछ बदलाव हो सकता है। बीपीएल परिवार के व्यक्ति के लिए कोई शुल्क देय नहीं है।

अगर सूचना प्राप्त होने के पश्चात किसी व्यक्ति को ऐसा प्रतीत होता है कि सूचना सही प्रदान नहीं की गई है या सूचना देने से मना कर दिया गया है तो वह प्रथम अपील में जा सकता है। सूचना अधिकारी से एक रैंक ऊपर का अधिकारी प्रथम अपील का अधिकारी माना जाता है।

जन सूचना अधिकारी के दायित्व

जन सूचना अधिकारी को एप्लीकेशन प्राप्त होने की तारीख से 30 दिन के भीतर सूचना देनी होती है। अगर वह ऐसा करने में अक्षम होता है या आवेदन लेने से इनकार करता है तो जिम्मेदार सूचना अधिकारी के ऊपर ₹ 250 प्रतिदिन के हिसाब से जुर्माना वसूल किया जाएगा एवं कुल जुर्माना ₹ 25,000 से अधिक नहीं होगा और उसको बाद में सूचना भी प्रदान करनी होगी।

अगर कोई RTI  जिसका सीधा सम्बन्ध जीवन रक्षा से संबंधित है तो उसे सूचना 48 घंटे के भीतर ही देनी होती है। यदि लोक सूचना अधिकारी यह समझता है की मांगी गई सूचना उसके विभाग से संबंधित नहीं है तो उसका कर्तव्य है कि वह उस आवेदन को संबंधित विभाग में भेजें एवं आवेदक को भी इसके बारे में सूचना दें।  ऐसी स्थिति में सूचना प्राप्त करने की अवधि 30 दिन से बढ़कर 35 दिन की हो जाती है।

किन मामलों में सूचना प्राप्त नहीं की जा सकती

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 8 के अनुसार निम्न मामलों में सूचनाएं प्राप्त नहीं की जा सकती है-

  • ऐसी सूचना जो भारत की संप्रभुता, अखंडता, राज्य की सुरक्षा और विदेश नीति से संबंधित हो।
  • ऐसी सूचना जिसका प्रकटन  न्यायालय या किसी अभिकरण द्वारा निषिद्ध किया गया हो।
  • कोई सूचना जिसका सम्बन्ध व्यापार गोपनीयता, बौद्धिक संपदा से हो एवं किसी व्यक्ति की व्यापार स्थिति खराब करने की गुंजाइश हो।
  • कोई भी ऐसी सूचना जो भारत से बाहर किसी अन्य देश के विश्वास में भारत सरकार को प्राप्त हुई हो।
  • सूचना जिससे किसी व्यक्ति के जीवन एवं सुरक्षा को खतरा हो।
  • सूचना जिससे अपराधियों की जांच पड़ताल या उनको पकड़ने में बाधा उत्पन्न हो।
  • मंत्रिमंडल के विचार विमर्श के कागजात।
  • धारा 9 के अंतर्गत जन सूचना अधिकारी सूचना पर पहुंच के अभाव में आवेदन निरस्त कर सकता है।

सूचना का अधिकार संशोधन विधेयक- 2019

लोकसभा में 22 जुलाई 2019 से लागू सूचना का अधिकार संशोधन विधेयक- 2019  कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह द्वारा पेश किया गया। इसमें किये गए महत्वपूर्ण संशोधन निम्न है –

सूचना आयुक्त का कार्यकाल

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 16 में वर्णित राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर क्रमशः आसीन मुख्य सूचना आयुक्त एवं सूचना आयुक्त का कार्यकाल 5 वर्ष का निर्धारित किया गया था परंतु इस संशोधन द्वारा इनके कार्यकाल का निर्धारण केंद्र सरकार द्वारा किया जाएगा।

वेतन में कटौती

संशोधन के द्वारा निर्धारित किया गया है कि अगर मुख्य सूचना आयुक्त एवं सूचना आयुक्त नियुक्ति के समय कोई पेंशन प्राप्त कर रहे हैं या पिछली सरकारी सेवाओं के लिए कोई सेवानिवृत्ति लाभ (Retirement Benefits) ले रहे हैं तो समान राशि उनके वेतन से कम कर दी जाएगी।

सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 13 में भी बदलाव किया गया इसमें निर्धारित किया गया कि राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय सूचना आयुक्त के वेतन, भत्ते, रोजगार की शर्ते सभी केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित की जाएगी।

सूचना का अधिकार का महत्व

 दोस्तों सूचना के अधिकार का महत्व हम निम्न पॉइंट के माध्यम से समझेंगे-

  • RTI के माध्यम से भ्रष्टाचार रोकने में मदद मिल सकती है। कोई भी सरकारी अधिकारी सूचना के बाहर जाने के भय से कोई भी भ्रष्ट काम करने से पहले एक बार अवश्य विचार करेगा।
  • RTI सरकारी संस्थाओं एवं सरकार को आम आदमी के प्रति जवाबदेह बनाता है।
  • कोई भी व्यक्ति के RTI  के माध्यम से उसको प्राप्त संविधानिक अधिकार सुनिश्चित कर सकता हैं।
  • सरकार के कामकाज, नीतियां, योजनाएं आदि की सूचना के माध्यम से सूचना की  पारदर्शिता बढ़ती है।
  • RTI सरकार एवं आम आदमी के बीच की खाई को पाटने का कार्य करता है।
  • जो सरकारी कार्यालय लापरवाही से कार्य कर रहे हैं उनकी छवि भी समाज के सामने प्रस्तुत करने का काम करता है।
  • नागरिकों द्वारा दिया जा रहा टैक्स क्या सरकार द्वारा उचित उपयोग में लाया जा रहा है या नहीं इसका भी पता किया जा सकता है।

RTI एक्ट के समक्ष चुनौतियां

  • RTI एक्ट के लागू होने से RTI अधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं को कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा हैं जिसमे उत्पीड़न एवं प्रताड़न शामिल हैं।
  • भारतीय नौकरशाही में आप सूचना मांग तो लेंगे लेकिन कार्यालयों में  रिकार्ड्स का पर्याप्त संरक्षण एवं देख-रेख का सख्त अभाव है।
  • RTI के पर्याप्त संचालन के लिए कर्मचारियों की संख्या अपर्याप्त है एवं जो RTI  अधिकारी  के रूप में नियुक्त है उन्हें अपने विभाग के दैनिक कार्य भी देखने पड़ते हैं। कुल मिलाकर आवेदक को सूचना 30 दिन के भीतर मिल जाए ये सुनिश्चित नहीं है।
  • शासकीय गोपनीयता अधिनियम- 1923 भी कई बार सूचना की पारदर्शिता में मुख्य बाधक बनता है।

निष्कर्ष

दोस्तों भारत गणराज्य में आरटीआई की आवश्यकता इसलिए पड़ी कि यहां सरकार एवं जनता के बीच सूचना के समन्वय का अभाव था। अगर सरकार आगे स्वयं सूचना समय-समय पर जनता के सामने प्रस्तुत करती रहें जिससे किसी व्यक्ति को आगे से सूचना प्राप्त करने की आवश्यकता ही न पड़े। राजस्थान का जन-सूचना पोर्टल इसका बेहतरीन उदारहण हैं।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को पिछले वर्ष इसके दायरे में लिया गया लेकिन आरटीआई से अभी भी कुछ संस्थान बाहर है। सभी राजनीतिक पार्टियां इसके दायरे से बाहर हैं। आने वाले कुछ समय में इस कानून में कुछ बदलाव भी देखने को मिल  सकते हैं । सुशासन, जनता की भागीदारी सुनिश्चित करने में इस एक्ट का आने वाले समय में भी बड़ा योगदान रहने वाला है।

तो दोस्तो कैसा लगा आपको ये आर्टिकल ? आप अपने विचार हमें नीचे कमेंट बॉक्स में बता सकते है।
धन्यवाद्।

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