अर्थव्यवस्था क्या हैं, क्या लौट रही है भारतीय अर्थव्यवस्था पटरी पर?

25 मार्च 2020 को कोरोना महामारी के प्रकोप से बचने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरे भारत में लॉकडाउन की घोषणा कर दी। इसके साथ ही भारतीय अर्थव्यवस्था डगमगानी प्रारंभ हो गई। वैसे लॉकडाउन से पूर्व भी कुछ महीनों से भारतीय अर्थव्यवस्था की कोई सराहनीय स्थिति नहीं थी। तो आइए दोस्तों कुछ भारतीय अर्थव्यवस्था का आकलन किया जाए, उससे पहले अर्थव्यवस्था की कुछ बुनियादी बाते जान लेते है जैसे की अर्थव्यवस्था क्या है, अर्थव्यवस्था कितने प्रकार की होती है।

अर्थव्यवस्था क्या है (What is Economics)

दोस्तों बिलकुल सरल भाषा में समझा जाए तो यहां अर्थ से “मुद्रा एवं संसाधन” और व्यवस्था से मतलब “प्रबंधन” लिया जा सकता है अर्थात मुद्रा एवं संसाधन का प्रबंधन ही अर्थव्यवस्था है। दूसरे शब्दों में अर्थव्यवस्था का अर्थ किसी देश का सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक ढांचा या संरचना है जिसमें वहां के लोग वैधानिक तरीकों से क्रियाएं कर जीवन यापन करते हैं।

किसी भी राष्ट्र द्वारा सामाजिक एवं आर्थिक सुधार करने के लिए उस देश के संसाधनों का उचित उपयोग होना आवश्यक है, इनका संपादन करने के लिए जो रणनीति बनाई जाती है अर्थव्यवस्था कहलाती है। अर्थव्यवस्था को सामान्यतः प्राथमिक द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

अर्थव्यवस्था के प्रकार (Types of Economy)

पूंजीवादी अर्थव्यवस्था

पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में अधिकतर उत्पादन क्षेत्रों पर निजी स्वामित्व होता है अर्थात ऐसी अर्थव्यवस्था में सरकार की भूमिका सीमित होती है। ये अर्थव्यवस्था अहस्तक्षेप के सिद्धांत पर कार्य करती है। निजी स्वामित्व की वजह से संसाधनों का कुशलतम उपयोग हो पाता है एवं उपभोक्ताओं की अधिकतम संतुष्टि का स्तर प्राप्त होता है।  पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के कारण आय एवं विषमता में वृद्धि हो सकती है। यह का एकाधिकार का भी सर्जन करता है।  अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, जापान, ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का उदाहरण है।

समाजवादी अर्थव्यवस्था

ये अर्थव्यवस्था पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के विपरीत है। ऐसी अर्थव्यवस्था में संसाधनों पर सार्वजनिक स्वामित्व होता है। अतः समाजवादी अर्थव्यवस्था में सरकार का हस्तक्षेप ज्यादा होता है। इस नियंत्रणकारी प्रकृति की वजह से  इसे नियंत्रित अर्थव्यवस्था भी कहा जाता है। इस अर्थव्यवस्था में कल्याणकारी उद्देश्यों हेतु राज्य स्वयं उत्पादन करके वितरण का कार्य करता है। इस व्यवस्था से एकाधिकार का जन्म नहीं होता। रूस, उत्तरी कोरिया, चीन की अर्थव्यवस्था इसके उदाहरण है।

मिश्रित अर्थव्यवस्था

दोस्तों जैसे कि इस अर्थव्यवस्था के नाम से ही स्पष्ट हो रहा है की इसमें पूंजीवादी एवं समाजवादी अर्थव्यवस्था का मिश्रण पाया जाता है। यहां संसाधनों से उत्पादन पर निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र दोनों का योगदान होता है। यहां सामाजिक कल्याण के साथ लाभ कमाने का उद्देश्य सम्मिलित होता है। हमारा देश भारत मिश्रित अर्थव्यवस्था का सर्वोत्तम उदाहरण है।

खुली अर्थव्यवस्था

खुली अर्थव्यवस्था में किसी भी व्यक्ति को कोई भी व्यापार करने की आजादी होती है लेकिन ऐसा नहीं हैं कि इन पर सरकारी नियंत्रण नहीं होता बल्कि सरकार ऐसी नीतियां बनाती है जो खुले व्यापार के लिए सुगम हों। खुली अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धा में वृद्धि, उपभोक्ता के पास अनेक विकल्प, व्यापार की आजादी आदि होते हैं। लेकिन सरकार के कम नियंत्रण की वजह से यह निजीकरण को बढ़ावा भी देती है। हांगकांग, सिंगापुर की अर्थव्यवस्था खुली अर्थव्यवस्था के उदाहरण है।

बंद अर्थव्यवस्था

ये खुली अर्थव्यवस्था के विपरीत अर्थव्यवस्था है। बंद अर्थव्यवस्था में आयात-निर्यात लगभग नगण्य होता है।  उपभोक्ताओं को सभी वस्तुओं की पूर्ति देश के भीतरी संसाधनों से ही की जाती है। यह व्यवस्था प्रतिस्पर्धा एवं संरक्षणवाद को हतोत्साहित करती है। 1991 के पूर्व भारत की अर्थव्यवस्था बंद अर्थव्यवस्था के समान ही थी।

विकसित अर्थव्यवस्था

विकास की विभिन्न अवस्थाओं के अनुसार विकसित अर्थव्यवस्था की अवधारणा भी मौजूद है। इस प्रकार की अर्थव्यवस्था में औद्योगिकीकरण, प्रति व्यक्ति आय, सकल घरेलू उत्पाद (GDP) और मानव विकास सूचकांक के मानको से ऊपर उठ चुकी होती है। ये अर्थव्यवस्था औद्योगिकरण की प्रथम एवं द्वितीय चरण पार करके तीसरे चरण में प्रवेश कर चुकी होती है। नार्वे, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, जर्मनी आदि विकसित अर्थव्यवस्था के उदाहरण है।

विकासशील अर्थव्यवस्था

विकासशील अर्थव्यवस्था में वो देश शामिल होते हैं जो अपने संसाधनों का समुचित दोहन करने में नाकाम रहें  है।  इन अर्थव्यवस्थाओं में औद्योगिकरण की प्रक्रिया देर से शुरू हुई इसलिए ये अभी औद्योगिकरण के दूसरे दौर में ही है। इस प्रकार की अर्थव्यवस्था में प्रति व्यक्ति आय, मानव विकास सूचकांक, GDP  निम्न स्तर पर होता है। विकासशील अर्थव्यवस्था में ऐसे देश सम्मिलित हैं जिन्हें उपनिवेशवाद से स्वतंत्रता काफी देर से मिली (1930- 1950)।  वर्तमान में कई देश इसके उदाहरण है उनमें से कुछ भारत, अफगानिस्तान, ईरान, नाइजीरिया, नेपाल, बांग्लादेश आदि हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था (Indian Economy)

भारत की अर्थव्यवस्था विश्व की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से है। वर्तमान में भारत सकल घरेलू उत्पाद के अनुसार दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। वही क्रय शक्ति (Purchasing Power parity) के अनुसार भारत का तीसरा स्थान है। भारत की GDP 2019-20 के लिए 2.06 ट्रिलियन US डॉलर रही है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत ने विकास की अभूतपूर्व दिशा प्राप्त की है। 1991 के उदारीकरण के परिणामस्वरूप इसमें और गति देखने को मिली। भारत की विशाल जनसंख्या, विविध प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता यहां निवेश के अवसरों को और आकर्षित करते हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत पिछले कुछ महीनों में

कोरोना वायरस महामारी ने भारत की अर्थव्यवस्था को ही नहीं अपितु समूचे विश्व की अर्थव्यवस्था को चपेट में ले लिया है। लेकिन इस आपदा से किसान, असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूर, छोटे व्यापारी सर्वाधिक प्रभावित हुए हैं। सांख्यिकी मंत्रालय के अनुसार राजकोषीय वर्ष 2020 की चौथीं तिमाही  में भारत की ग्रोथ गिरकर 3.1% पर आ गई है। प्रतिकूल इकोनॉमिक प्रभाव एवं उपभोक्ताओं के फुटफॉल में गिरावट के कारण सेवा क्षेत्र को भी मंदी की मार झेलनी पद रही हैं।

इस वैश्विक मंदी ने भारत पर निम्न प्रभाव छोड़े हैं-
  • बेरोजगारी में तेजी से वृद्धि हुई हैं।
  • सप्लाई चेन में रुकावट।
  • पर्यटन उद्योग का ठप हो जाना।
  • सरकार की आय में भारी गिरावट (जीएसटी के कम संग्रहण के कारण)
  • उत्पादन में गिरावट।

इन प्रमुख नुकसानों में बेरोजगारी एवं पर्यटन उद्योग पर प्रभाव लंबे समय तक जारी रहने की आशंका है। भारतीय अर्थव्यवस्था प्रारम्भ से ही मुख्यतः कृषि पर निर्भर थी परंतु पिछले कुछ दशकों से सेवा एवं उद्योग क्षेत्र ने देश की अर्थव्यवस्था को नया आयाम दिया हैं।

मांग में कमी कारण निजी क्षेत्र के उद्योगों से मजदूरों एवं कर्मचारियों को निकाला जा रहा है। इसके फलस्वरूप न केवल उद्योग क्षेत्र की प्रगति में गिरावट आई है वरन बेरोजगारी में भी वृद्धि हुई है। लॉकडाउन से मंदी का प्रभाव उद्योगों, पर्यटन, सिनेमा उद्योग, होटल, रेस्टोरेंट, परिवहन सुविधाओं सभी पर पड़ा है। 

उत्पादन पर प्रभाव

IIP  रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल 2020 में गिरावट
  • विनिर्माण उत्पादन में 64.3%  की गिरावट
  • खनन उत्पादन में 27.4% की गिरावट
  • विद्युत उत्पादन में 22.6% की गिरावट
  • प्राथमिक उत्पाद में 26.6%  एवं वस्तुगत उत्पादों  में 92% की गिरावट।

संक्षेप में इस गिरावट का सार लिया जाए तो कुल औद्योगिक उत्पादन में 55.5% की गिरावट दर्ज की गई है।

 

क्या भारतीय अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट रही है

31 मई 2020 को लॉकडाउन समाप्त होने के पश्चात भारतीय अर्थव्यवस्था में तेजी देखी गई है। अब यह सवाल पैदा होता है कि क्या हमारी अर्थव्यवस्था कोविड से पहले की स्थिति में पहुंच चुकी है? लॉकडाउन खुलने के साथ ही उद्योग सेक्टर ने अपने उत्पादन में काफी बढ़ोतरी की है। एक राज्य से दूसरे राज्य में ट्रांसपोर्ट होने वाले सामान के ऊपर लगने वाले  ई वे बिल (E -WAY Bill)  की स्थिति लगभग उसी स्थिति में पहुंच गई है जो पहले की स्थिति में थी।

गूगल की रिपोर्ट एवं विभिन्न सेक्टरों से आई अलग-अलग रिपोर्ट से यह स्थिति साफ है कि भारत की अर्थव्यवस्था  वापस रफ़्तार पकड़ चुकी हैं।

क्या है तेजी की वजह

इस तेजी के विभिन्न कारण हो सकते हैं इनमें से पहला एवं प्रमुख कारण सरकार के द्वारा की गई राहत घोषणाएं एवं सहायता है। इन राहत पैकेज से कई सेक्टरों को उभरने में मदद मिली है। दोस्तों अर्थव्यवस्था के उतार-चढ़ाव में मांग एवं पूर्ति का सर्वाधिक योगदान होता है। लगभग 2 महीने से लोगों ने अपनी मांग वस्तुओं पर सीमित या बंद कर दी थी।  लेकिन लॉकडाउन चरण में जो मांग अप्रैल-मई में नगण्य थी उसकी भरपाई जून-जुलाई 2020 में तेजी से हो रही हैं। अगर मांग ऐसे ही बढ़ती रही तो उत्पादन भी बढ़ेगा।

क्या तेजी जारी रहेगी

लॉकडाउन खुलने के बाद जो तेजी अर्थव्यवस्था में आई है क्या वह और आगे भी जारी रहेगी इस पर संशय हैं। अभी भी कई राज्यों में राज्य सरकार द्वारा कोरोना वायरस से बचने के लिए सिलेक्टिव बेसिस पर लॉक डाउन लगाया जा रहा है। यह आंशिक लॉक डाउन अवश्य इन आर्थिक गतिविधियों की गति में रोक लगा सकता है। महाराष्ट्र, दिल्ली, तमिलनाडु जैसे बड़े आर्थिक राज्यों में हालात जस के तस बने हुए हैं। जब तक यहाँ से  अर्थव्यवस्था में योगदान नहीं आएगा विकास की चाह करना बेईमानी होगा। जैसा कोरोना वायरस का प्रकोप थमने का नाम नहीं ले रहा है ये तेजी कभी भी विपरीत दिशा पकड़ सकती हैं।

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निष्कर्ष

जो तेजी के आंकड़े गूगल ने जारी किए हैं उन आंकड़ों के आधार पर ये काफी अच्छे कहे जा सकते हैं, परंतु जमीनी हकीकत कुछ अलग ही बयान करती है। लगभग सभी सेक्टरों में बहुत सी नौकरियां चली गई है कई सरकारी डिपार्टमेंट के कर्मचारियों को कई महीनों से सैलरी नहीं मिल रही है इससे साफ है कि इन  लोगों की आय में भारी गिरावट आ रही है और यह गिरावट इनकी EMI का भुगतान नहीं करने से लेकर बैंक की बैलेंस शीट को खराब करने तक का कार्य कर सकती है। यदि बैंकों की स्थिति खराब होती है तो यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए कतई  अच्छा नहीं होगा।

सरकार ने गरीबों के लिए कई योजनाएं चलाकर उन्हें उभारने का प्रयास किया हैं परंतु भारतीय अर्थव्यवस्था मिडिल क्लास परिवारों के ऊपर अधिक निर्भर करती है। अतः सरकार को इनकी समस्याओं जैसे की आय स्थिरता, रोजगार के अवसर आदि के लिए प्रभावी योजनाएं बनानी चाहिए।

सरकार को प्रभावी एवं स्थायी नीतियां कृषि के ऊपर भी बनानी  होगी। इससे अर्थव्यवस्था ऊपर की ओर अग्रसर होगी। इसमें फूड प्रोसेसिंग एवं कृषि उत्पादों के निर्यात पर अधिक ध्यान केंद्रित करके अच्छे परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। आखिर कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है।

दोस्तों कैसी लगी आपको ये जानकारी आप अपने सुझाव नीचे कमेंट बॉक्स में बता सकते हैं।
 
 

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