भारत-चीन युद्ध 1962 – कारण , परिणाम (India-China War 1962)

भारत-चीन सीमा विवाद कोई नया विवाद नहीं है। भारत चीन 1962 का युद्ध भी इसी तर्ज पर लड़ा गया था लेकिन इसमें कुछ अन्य कारण  भी थे। आइये भारत चीन 1962 युद्ध के कुछ अन्य महत्वपूर्ण तथ्य समझते है – 

प्रारंभिक संबंध और युद्ध के कारण 

भारत की आज़ादी के 2 साल बाद 1949 में  चीन में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना हुई।  शुरुवाती संबंध दोनों देशो के मध्य अच्छे थे। जब चीन दुनिया में अलग-थलग पड़ गया था, उस समय भी भारत चीन के साथ खड़ा था।

भारत-चीन के बीच शांतिपूर्ण संबंधों को लेकर 1954  में पंचशील समझौता हुआ , इसी समझौते से भारत ने तिब्बत में चीन के  शासन को स्वीकार किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने “भारत-चीनी भाई-भाई” का नारा दिया। कुछ वर्ष पश्चात  1959 में दलाई लामा के भारत में शरण लेने के बाद दोनों देशों के संबंधों में तनाव आने लगा और भारत चीन सीमा पर हिंसक घटनाओं की एक श्रृंखला शुरू हो गयी।यही भारत-चीन युद्ध की बड़ी वजह बना। 

दूसरा मुख्य कारण हिमालय क्षेत्र का सीमा विवाद था। भारत मानता था कि सीमा का निर्धारण ब्रिटिश सरकार के समय सुलझाया जा चुका है, पर चीन इससे सहमत नहीं था। चीन ने भारतीय सीमा के महत्वपूर्ण क्षेत्र- जम्मू-कश्मीर के लद्दाख वाले हिस्से के अक्साई-चिन और अरुणाचल प्रदेश के कई हिस्सों पर अपना दावा जताया। नेहरू और माओत्से तुंग के बीच कई वार्ताओं के बाद भी मसला नहीं सुलझा, इससे मामला युद्ध की और बढ़ने लगा।  

भारत-चीन के बीच विवादित जगह 

पैंगोंग झील-  

इस झील का 90 कि.मी चीन में और 45 कि.मी  भारत में पड़ता है। इस क्षेत्र में दोनों देशों के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर सहमति नहीं है। ये झील चुशूल घाटी के रास्ते में आती है। चीन इस रास्ते का इस्तेमाल भारत-अधिकृत क्षेत्र में हमले के लिए कर सकता है। साल 1962 के युद्ध के दौरान यही वो जगह थी जहां से चीन ने अपना मुख्य आक्रमण शुरू किया था।

गालवन घाटी-

गालवन घाटी विवादित क्षेत्र अक्साई चीन में आता है। गालवन घाटी लद्दाख़ और अक्साई चीन के बीच भारत-चीन सीमा के नज़दीक स्थित है। यहां पर वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC ) अक्साई चीन को भारत से अलग करती है।

डोकलाम-

चीन 2017 में डोकलाम में भारत में कई आगे बढ़ गई था।डोकलाम चीन और भूटान के बीच का विवाद है, लेकिन सिक्किम बॉर्डर के नज़दीक ही पड़ता है। ये इलाक़ा सामरिक रूप से भी अहम है।

तवांग-

तवांग (अरुणाचल प्रदेश) को चीन तिब्बत का हिस्सा मानता है। 1962 में भी भारत-चीन के युद्ध के दौरान चीन ने तवांग पर कब्जा कर लिया था लेकिन अरुणाचल प्रदेश की भौगोलिक स्थिति भारत के पक्ष में  होने की वजह से चीन को तवांग  से पीछे हटना पड़ा। 

नाथूला- 

नाथूला हिमालय का एक पहाड़ी दर्रा है जो भारत के सिक्किम राज्य और दक्षिण तिब्बत में चुम्बी घाटी को जोड़ता है।

युद्ध के दौरान- 

भारत चीन के बीच 1962 में हुए युद्ध में अगर तुलनात्मक सैनिक क्षमता देखी जाए तो भारत की ओर से इस युद्ध में 10 से 12 हजार सैनिक उतरे थे जबकि चीन की  ओर से  80,000.  युद्ध के मैदान में भारत की अपेक्षा चीन लगभग 8 गुना अधिक सैनिकों के साथ उतरा था लेकिन लेकिन उन्हें भारतीय सैनिकों की ओर से कड़ा मुकाबला मिला। चौंकाने वाली बात ये रही कि दोनों देश के हताहत सैनिकों के संख्या में कोई बड़ा अंतर नहीं था।

युद्ध में भारत की ओर से 1383 सैनिक शहीद हुए। वहीं चीन के लगभग 722 सैनिक मारे गए। घायल सैनिकों की बात की जाए तो 1962 के युद्ध में चीन के सैनिक अधिक घायल हुए थे। चीन के लगभग 1697 सैनिक घायल हुए थे, वहीं भारत के 1,047 घायल हुए।

दोनों देशों के बीच अगर कुल क्षति की बात की जाए तो कोई अधिक अंतर नहीं था। भारत के इस युद्ध में घायल और शहीद होने वालों की संख्या 2430 थी वहीं चीन के घायल और मरने वाले सैनिकों की संख्या 2417 थी। 

युद्ध की अवधी –

चीन ने भारत पर 20 अक्टूबर 1962 को आक्रमण किया, यह युद्ध 21 नवंबर तक चला। 20 अक्टूबर का दिन हर साल National Solidarity Day के तौर पर याद रखा जाता हैं।  

भारत-चीन 1962 युद्ध का परिणाम –

इस युद्ध में सैन्य विजय तो एक प्रकार से चीन की हुई हुई लेकिन उसने अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि को विश्व परिद्र्श्य मे  गिरा दिया। इसके बाद में भारत ने फॉरवर्ड नीति का त्याग किया और वास्तविक नियंत्रण रेखा वास्तविक सीमा में परिवर्तित कर दी गई। 

भारत को भी इस संघर्ष के बाद में अपनी सेना में व्यापक बदलाव करने पड़े, इससे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर काफी दबाव आ गया और उनके ऊपर कई आरोप लगाए गए। भारतीय सैन्य कमजोरी को महसूस करके पाकिस्तान ने जम्मू और कश्मीर में घुसपैठ शुरू कर दी जिसकी परिणिति अंततः 1965 में भारत के साथ दूसरा युद्ध से हुआ।

भारत-चीन युद्ध में भारत की हार का कारण

जवाहर लाल नेहरू उस समय को सही भांति भाप नहीं पाए उन्होंने चीन  के सोवियत संघ से  संबंध सही नहीं होने के वजह से सोचा भी नहीं की चीन भारत पर आक्रमण कर सकता है। सरदार पटेल ने पंडित नेहरु को चीन के बारे में चेतावनी दी थी कि चीन तिब्बत पर क़ब्ज़ा कर लेगा। परंतु नेहरु जी ने सरदार पटेल की चेतावनी को नज़रंदाज़ कर दिया । जब चीन ने तिब्बत पर क़ब्ज़ा किया और लद्दाख़ में भारतीय सीमा के काफ़ी अंदर रोड बना लिया तो नेहरु जी की नींद खुली । 

युद्ध के समय भारतीय सेना का पूर्ण रूप से तैयार नहीं होने की मुख्य  वजह तत्कालीन रक्षा मंत्री मेनन थे। उन्होंने इस समय अनुभवहीन बीएम कौल को लेफ्टिनेंट जनरल बना दिया।  युद्ध के दौरान वो स्वयं अस्वस्थ हो गए थे। बाद में रक्षा मंत्री मेनन को  इस्तीफा देना पड़ा।

मलिक जो उस वक्त ख़ुफ़िया एजेंसी के प्रमुख थे, उन्होंने चीन के भारत के प्रति व्यवहार को सही तरह से परख ना पाये ना ही कोई उचित नीति बना पाये।  चीन के संकेतो पर ख़ुफ़िया एजेंसी ने भी कोई कदम नहीं उठाये। 

चीनी वायु सेना के डर से भारत ने अपनी वायु सेना का उपयोग ही नहीं किया । वास्तव में चीनी वायु सेना उस समय बहुत अच्छी स्थिति में नहीं थी और भारतीय वायु सेना लड़ाई की दिशा बदलने की क्षमता रखती थी। 

अंतिम परन्तु महत्वपूर्ण बात ये थी की उस समय पर भारत के पास कोई पुख्ता युद्ध नीति का अभाव था।  

युद्ध के बाद भारत की स्थिति– 

युद्ध के बाद भारत सरकार  को चारो ओर से आलोचना झेलनी पड़ी। भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति ने भी सरकार और रक्षा नीतियों की आलोचना की।  देश में अस्थिरता आने लगी। इस युद्ध के कारण भारत को चीन की नियति  का पता चला। भारत-चीनी भाई-भाई के नारे का विरोध हुआ और भारत को कूटनीति का महत्व समझ आया।  युद्ध के उपरांत हार की मुख्य वजहों  जानने के लिए हेंडरसन-ब्रूक्स-भगत कमिटी का गठन किया गया।  इस कमिटी की रिपोर्ट्स  कभी भी खुलकर प्रकाशित नहीं की गई।  

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दोस्तों इस युद्ध पर आप अपनी राय नीचे कमेंट करके बता सकते है।

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