भारतीय बैंकिंग व्यवस्था- इतिहास, राष्ट्रीयकरण एवं चुनौतियां

बैंक किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में मुख्य धुरी होते हैं। भारत में पिछले कुछ दशकों में बैंकिंग प्रणाली में काफी बदलाव आया है। भारतीय बैंकिंग सिस्टम वर्तमान में विश्व की सबसे बड़ी व्यवस्थाओं में से एक है। भारतीय बैंकिंग व्यवस्था के तहत हम आज जानेंगे बैंकिंग का इतिहास, बैंको के प्रकार, बैंकिंग व्यवस्था, बैंकों का राष्ट्रीयकरण एवं बैंकों के समक्ष चुनौतियां।

भारतीय बैंकिंग का इतिहास

भारतीय बैंकिंग को पुरानी महाजन व्यवस्था से जोड़कर देखा जाता है जिसमे महाजन लोगो को पैसा ब्याज पर उधार देते थे और आवश्यक समय में उनका पैसा संभाल के भी रखते थे। भारत में बैंकिंग का इतिहास बहुत पुराना है भारत में पहला बैंक 18वीं सदी में 1770 में कोलकाता में “बैंक ऑफ हिन्दुस्थान” के नाम से खोला गया था। यह बैंक यूरोपीय पद्धति के तहत विदेशी पूंजी के सहयोग से एलेग्जेंडर एंड कंपनी के द्वारा स्थापित किया गया था। लेकिन बैंक ऑफ हिंदुस्तान ज्यादा सफलता नहीं पा सका एवं कुछ वर्षों बाद ही इसे बंद करना पड़ा।

इसके बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने व्यापार के मुख्य केंद्र बंगाल में 1809 में बैंक ऑफ बंगाल खोला। इसके बाद 1840 में बैंक ऑफ बॉम्बे, 1843 बैंक ऑफ मद्रास की स्थापना की गई। ये तीनों बैंक प्रेसीडेंसी बैंक कहलाये। जब 1857 की क्रांति के परिणामस्वरुप भारतीय शासन ब्रिटिश महारानी के पास आ गया तब इन तीनो बैंको को  मिलाकर 27 जनवरी 1921 में इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया का नाम दे दिया गया। वर्ष 1955 में गोरेवाला कमेटी की सिफारिशों के आधार पर इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया का राष्ट्रीयकरण कर एक नया  बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बना दिया गया।

पूर्ण रूप से भारतीय पद्धति पर कार्य करने वाला पहला बैंक अवध कामर्शियल बैंक था जिसकी स्थापना 1881 में हुई थी। भारत के सबसे पुराने बैंकों में से एक है इलाहाबाद बैंक जिसकी स्थापना वर्ष 1865 में की गई थी। भारत का पहला पूर्णतया भारतीय बैंक पंजाब नेशनल बैंक था  जिसकी स्थापना सन 1894 में की गई थी। 

बैंक क्या होता है

वैसे बैंक की कोई सर्वमान्य परिभाषा नहीं है परन्तु साधारण भाषा में बैंक ऐसा वित्तीय संस्थान होता है जो जनता के धन को सुरक्षित रखने का कार्य करता हैं जिसमें लोग पैसा जमा कराते हैं एवं आवश्यकता पड़ने पर निकाल सकते हैं। बैंक जमा राशि पर ब्याज का भुगतान भी करता है। बैंकों के कार्यों में शामिल है राशि जमा करना,  ऋण प्रदान करना, आभूषण एवं अन्य बहुमूल्य वस्तुओं के लिए लॉकर सुविधा देना चेकों का संग्रहण एवं भुगतान। इसके अलावा वर्तमान में बैंक डिमैट सुविधा, म्युचुअल फंड, इंश्योरेंस आदि सुविधाएं भी प्रदान करते हैं।

बैंकों के प्रकार

बैंक के कई प्रकार होते हैं जो अपने कार्य एवं क्षेत्र के आधार पर संचालित होते हैं। बैंको को निम्न भागो में बांटा जा सकता हैं।

व्यापारिक/वाणिज्यिक बैंक(Commercial  Banks)

व्यापारिक बैंक बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट- 1949 के तहत कार्य करने वाले बैंक होते हैं। इनके मुख्य कार्यों में पैसा जमा करना एवं कॉरपोरेट, सरकारों को ऋण प्रदान करना होता है। वर्तमान समय में व्यापारिक बैंक साख निर्माण का भी कार्य करते है। व्यापारिक बैंकों को हम आगे चार भागों में विभाजित कर सकते हैं।

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (PSU Banks)

यह राष्ट्रीयकृत बैंक होते हैं। वर्तमान में बैंकिंग कारोबार का लगभग 75% हिस्सा इनके पास है। सार्वजनिक बैंकों के 50% से अधिक शेयर सरकार के पास होते है। 1 अप्रैल 2020 से कुछ बैंकों के विलय के पश्चात वर्तमान में भारत में 12 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक कार्यरत है।

निजी क्षेत्र के बैंक (Private Banks)

यह ऐसे बैंक होते हैं जिनके अधिकांश शेयर निजी शेयरधारकों के पास होते  है। RBI का नियंत्रण निजी बैंकों के ऊपर भी होता है। निजी क्षेत्र एवं सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक दोनों के कार्य लगभग समान ही होते हैं। वर्तमान में भारत में  प्राइवेट सेक्टर बैंकों की संख्या 22 है। HDFC बैंक और ICICI बैंक क्रमशः पहले और दूसरे स्थान पर निजी क्षेत्र में अपनी  हिस्सेदारी रखते हैं।

विदेशी बैंक (Foregin Banks)

इन बैंकों में वह बैंक शामिल है जिनका मुख्यालय भारत के बाहर स्थित है।  यह बैंक अपने देश के बैंकिंग नियमों के साथ-साथ भारतीय बैंकिंग नियमों का भी पालन करते हैं।  वर्तमान में 45 विदेशी बैंक भारत में कार्यरत है।

क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (RRB Banks)

यह बैंक भी कमर्शियल बैंक की भांति ही होते हैं। ये बैंक क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक अधिनियम – 1976 द्वारा स्थापित होते हैं। ग्रामीण बैंक मुख्यतः किसानों, मजदूरों, छोटे व्यापारियों की सुगमता के लिए स्थापित किए जाते हैं।

स्मॉल फाइनेंस बैंक

इनके द्वारा ऐसे व्यक्तियों को बैंकिंग सुविधाएं दी जाती है जिनको अन्य बैंक सेवाएं प्रदान नहीं करते हैं। इन बैंकों के मुख्य ग्राहकों में छोटे उद्योग, किसान, छोटे व्यवसाय शामिल होते हैं। ये बैंक स्मॉल फाइनेंस बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट 1949 की धारा 22 के अंतर्गत स्थापित होते हैं। स्मॉल फाइनेंस बैंक में मुख्यत NBFC,  लोकल एरिया बैंक्स, Micro financial Institutions शामिल होते हैं। इन बैंकों पर आरबीआई एवं फेमा का नियंत्रण होता है। स्मॉल फाइनेंस बैंक के कुछ उदाहरण है ए. यू. स्मॉल फाइनेंस बैंक उज्जीवन स्मॉल फाइनेंस बैंक।

सहकारी बैंक(Co-operative Bank)

सहकारी बैंक सहकारी समिति अधिनियम- 1912 के अनुसार स्थापित एवं रजिस्टर होते हैं। यह नो प्रॉफिट नो लॉस के आधार पर कार्य करने वाले बैंक होते हैं। सहकारी बैंक शहरी कॉरपोरेशन बैंक एवं स्टेट कॉरपोरेशन बैंक में विभाजित होते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य शहरी क्षेत्रों में छोटे कारोबारियों, छोटे उद्योगों को सेवा देना होता है।  ग्रामीण क्षेत्रों में यह मुख्य रूप से कृषि एवं सहायक गतिविधियों में अपनी सेवाएं देते हैं।

पेमेंट बैंक

यह बैंकिंग दिशा में नया मॉडल है। यह आरबीआई द्वारा स्थापित होते हैं। इनमें कुछ सीमाओं के साथ ही बैंकिंग व्यवहार किए जा सकते हैं। वर्तमान में पेमेंट बैंक में 1 लाख तक की सीमा के साथ धनराशि जमा करा सकते हैं।

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बैंकों का राष्ट्रीयकरण

राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया में सरकार किसी निजी बैंक को खरीद लेती है और उसमे अपनी हिस्सेदारी 50% से अधिक कर लेती है। बैंकों के राष्ट्रीयकरण करने की कई प्रमुख वजहें रहीं। राष्ट्रीयकृत होंने वाले 14 बैंकों के पास उस समय देश की 80% जमा पूंजी थी। यह बैंक कुछ लोगों की मनमानी से ही चल रहे थे यह बैंक उसी को लोन देते थे जहां से इनको अधिक लाभ की आशा हो। ग्रामीण क्षेत्र और छोटे शहरों में बैंक नगण्य संख्या में थे। यह बैंक देश की अर्थव्यवस्था में कोई खास योगदान नहीं दे पा रहे थे। 1947 से 1955 के बीच 360 छोटे-मोटे बैंक डूब गए थे जिनमे कई लोगों की जमा राशि डूब गई थी। 

द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत कई राष्ट्रों में केंद्रीय बैंक को सरकार के अधीन करने की योजना का उदय हुआ। भारत ने भी 1949 में RBI का राष्ट्रीयकरण कर दिया। सामाजिक विकास एवं आम लोगों को साथ लाने के उद्देश्य से 19 जुलाई 1969 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश के 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इसमें 50 करोड़ से अधिक जमा राशि वाले बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था। द्वितीय चरण में 15 अप्रैल 1980 को 6 बैंकों का ओर राष्ट्रीयकरण किया गया। 

बैंकों का विलय

बढ़ते कामकाज एवं NPA की वजह से कई बार सरकार को बैंकों का विलय करना पड़ा है। भारी परिचालन लागत ,बढ़ते NPA , कमजोर वित्तीय स्थिति की समस्या छोटे बैंकों के लिए खड़ी हो जाती है। बैंकिंग सुधारों के तहत एन. नरसिम्हन समिति प्रथम -1991 एवं  द्वितीय- 1998 ने बैंकों के विलय की सिफारिशें की थी। इसके अतिरिक्त पीजे नायक समिति ने भी बैंकों के निजीकरण एवं विलय की सिफारिश की थी।

भारत में बैंकों का विलय अब तक कई बार हो चुका है। 1993-94 पंजाब नेशनल बैंक और बैंक ऑफ इंडिया का विलय हुआ। इस विलय को भारत में पहले दो राष्ट्रीय बैंकों का विलय कहा जाता है। इसके बाद भी भारत में बैंकों के कई विलय हुए उनमें से कुछ है 2008 में स्टेट बैंक ऑफ़ सौराष्ट्र का, 2010 में स्टेट बैंक ऑफ इंदौर का भारतीय स्टेट बैंक में विलय। 1 अप्रैल 2017 को एसबीबीजे, स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद, स्टेट बैंक ऑफ मैसूर, स्टेट बैंक ऑफ पटियाला, स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर, भारतीय महिला बैंक का विलय भारतीय स्टेट बैंक में कर दिया गया।

1 अप्रैल 2019 को विजया बैंक और देना बैंक का बैंक ऑफ बड़ौदा में विलय हुआ। हाल फिलहाल में 1 अप्रैल 2020 को ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स और यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया का पंजाब नेशनल बैंक में आंध्र बैंक कॉरपोरेशन बैंक का यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया में इलाहाबाद बैंक का इंडियन बैंक में और सिंडिकेट बैंक का केनरा बैंक में विलय हुआ। इन सब के पश्चात वर्तमान में भारत में 12 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक रह गए हैं।

भारतीय बैंकिंग – चुनौतियां

  • वर्तमान में लगभग सभी बैंक NPA (गैर निष्पादित परिसंपत्तिया)  की समस्या से जूझ रहे हैं। आरबीआई रिपोर्ट के अनुसार 2018-19 के लिए NPA 9.1 प्रतिशत रहा है। NPA ऐसे ही बढ़ता रहा तो बैंकों के परिचालन में काफी मुश्किलें आने वाली है।
  • इसके अतिरिक्त समय-समय पर कई राजनीतिक पार्टियों द्वारा अपने राजनीतिक स्वार्थ की वजह से ऋण माफी योजना भी इनके सामने कई चुनौतियां प्रस्तुत करती रहती है।
  • पुराने समय में बैंकिंग बहीखातों के माध्यम से ही की जाती थी परन्तु बदलती तकनीक में बैंकिंग कंप्यूटर के माध्यम से शुरू हो चुकी है। सभी विवरण ऑनलाइन रहने से सुरक्षा एवं परिचालन लागतों में भारी वृद्धि हुई है।
  • वर्तमान में सरकारों ने प्राइवेट बैंकों में FDI में 74%  तक की मंजूरी दे रखी है जिससे भारतीय बैंकों को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है।  RBI ने NBFC को भी मंजूरी दे रखी है जिसे बैंकिंग सेक्टर में गला काट प्रतिस्पर्धा का माहौल बन गया है।
  • बैंकिंग सेक्टर में गोपनीयता एवं सुरक्षा की भी कड़ी चुनौतियां हमेशा बनी रहती है।
  • समय-समय पर कई बैंक घोटाले सामने आते रहते हैं इन घोटालों से बैंक की स्थिति बिल्कुल खराब हो जाती है।  विजय माल्या, नीरव मोदी आदि इन घोटालों के उदाहरण हैं।  यह तो वह घोटाले हैं जो सामने आ जाते हैं परंतु कई घोटाले ऐसे हैं जिनका पर्दाफाश नहीं हो पाता हैं।
  • 2008 के वित्तीय संकट के उपरांत बैंकों की नियामक शुल्क में बड़ी वृद्धि कर दी गई जिसका सीधा संबंध रिवेन्यू और ऋण घाटे से संबंधित है।
  • नित बढ़ते बैंकिंग नियमों ने भी बैंकिंग सेक्टर के समक्ष चुनौतियां खड़ी कर दी है।  बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच ग्राहकों की इच्छाओं में बढ़ोतरी हुई है इन सबके बीच बैंक को अपने ग्राहकों को बनाए रखना काफी कठिन हो गया है।

निष्कर्ष

दोस्तों बैंकिंग सेक्टर किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का आधारभूत ढांचा प्रदान करता है।  बैंकों ने जो प्रगति पिछले कुछ दशकों से हासिल की है वह काफी सराहनीय है। सरकार भी समय -समय पर बैंको का पूंजीकरण कर इनको उभरने में मदद करती है। बैंकों का विस्तार अब लगभग देश के हर कोने में है।

बढ़ती तकनीकी ने बैंकिंग को और आसान बना दिया है। लोग मोबाइल एवं इंटरनेट बैंकिंग का इस्तेमाल कर पा रहे हैं  जिनसे उनको बार-बार शाखा में नहीं जाना पड़ता। एटीएम का अनुप्रयोग बैंकिंग सेक्टर में एक क्रांतिकारी मोड लेकर आया है। भावी समय में भी अगर भारत को विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बने रहना है तो इसमें भारतीय बैंकिंग सेक्टर का बहुत योगदान रहने वाला है। अंत में उन बैंकर्स को सलाम जिन्होंने बैंकिंग सेक्टर को गति प्रदान की है।

तो दोस्तो कैसा लगा आपको ये आर्टिकल ? आप अपने विचार हमें नीचे कमेंट बॉक्स में बता सकते है।
धन्यवाद्।

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