भारत छोड़ो आंदोलन 1942 – कारण, नेतृत्व और परिणाम

भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति की पूरी दास्तां पर जितनी बात की जाए उतनी ही कम है। इस कहानी में एक अंतिम एवम दिलचस्प मोड़ था भारत छोड़ो आंदोलन 1942 । तो आइए दोस्तों आपको भारत छोड़ो जैसे क्रांतिकारी आंदोलन से रूबरू करवाते हैं। 

भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभूमि

भारत छोड़ो आन्दोलन की बात की जाये तो ये द्वितीय विश्व के समय प्रारंभ हुआ था। द्वितीय विश्व युद्ध जो सितंबर 1939 को प्रारंभ हुआ था अपने विध्वंसक रूप से समूचे विश्व को चपेट में ले चुका था। द्वितीय विश्व युद्ध में विश्व मित्र राष्ट्रों एवं धुरी राष्ट्रों में बंट चुका था। जर्मनी, जापान और इटली शेष विश्व पर भारी होते जा रहे थे।

जापान की मंशा भी भारत पर आक्रमण करने की दिख रही थी। इस हेतु जापानी सेना रंगून तक पहुंच भी चुकी थी। ब्रिटेन को विश्व युद्ध में भारतीयों के सहयोग की उम्मीद नहीं थी जबकि अमेरिका, चीन और रूस लगातार ब्रिटेन के ऊपर भारतीयों का सहयोग हासिल के लिए दबाव बना रहे थे।

भारत छोड़ो आंदोलन के कारण

भारत छोड़ो आंदोलन प्रारंभ होने के कई मुख्य कारण थे। ब्रिटिश सरकार ने मार्च 1942 में सर स्टेफोर्ड क्रिप्स, जो लेबर पार्टी से संबंधित थे कि अध्यक्षता में भारत को भेजा। इस समय ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल थे।ये क्रिप्स मिशन के नाम से जाना गया। क्रिप्स मिशन का मुख्य उद्देश्य विश्व युद्ध में कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग के नेताओं के साथ मिलकर भारतीयों का सहयोग प्राप्त करना था। इसमें भारतीयों को वादा किया गया कि वह युद्ध के उपरांत भारत को औपनिवेशक राज्य (डोमिनियन स्टेट) का दर्जा दे देंगे। डोमिनियन स्टेट की मांग अगस्त 1928 में नेहरू रिपोर्ट के माध्यम से उठाई जा चुकी थी जो अब अप्रासंगिक हो चुकी थी। इस प्रस्ताव को कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग दोनों ने ठुकरा दिया। गांधीजी ने क्रिप्स मिशन को “दिवालिया बैंक का अग्रगामी चेक” की संज्ञा दी। 

क्रिप्स मिशन जैसे हथकंडो से भारतीयों को आभास हो चूका था कि अंग्रेजी सरकार का शासन भारतीयों को सौंपने का इरादा नहीं है। इस प्रकार क्रिप्स मिशन की असफलता भारत छोड़ो आंदोलन का मुख्य कारण बनी।

द्वितीय विश्व युद्ध के कारण लोगों को आवश्यक वस्तुओं की पूर्ति नहीं हो पा रही थी एवम वस्तुओं के दामों में भी भारी वृद्धि हो गई थी। इन सब से लोगों में ब्रिटिश सरकार के प्रति विश्वास उठने लग गया, नौबत यहाँ तक आ पहुची की लोगों ने बैंको से पैसा तक निकालना शुरु कर दिया था।

भारत के ऊपर जापानियों के आक्रमण का खतरा भी मंडरा रहा था। वैसे जापान आजाद हिंद फौज का साथ दे रहा था। ये सब तार आपस में जुड़े हुए थे। दक्षिण-पूर्वी एशिया में ब्रिटेन की पराजय से ब्रिटेन की अपराजय का सिद्धांत टूटा। इससे भारतीयों को लगने लगा की वो भी ब्रिटिश हुकूमत से छुटकारा पा सकते है। 

1939 में लार्ड लिनलिथगो ने भारतीयों की सहमति के बिना भारत को युद्ध में शामिल करने की घोषणा कर दी। प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) में भारत ने ब्रिटेन का साथ दिया था जिसका उसको कोई फायदा नहीं हुआ।

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भारत छोड़ो आंदोलन की रूपरेखा

दोस्तों जब महात्मा गांधी के अहिंसा के सभी  प्रयास विफल साबित हुए तो उन्होंने अंत में एक अलग ही रास्ता चुना। स्वतंत्रता प्राप्ति के मुद्दों पर 1939 से ही महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस में भी विवाद उत्पन्न हो चुका था।

14 जुलाई 1942 को कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने वर्धा में भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पारित किया। इसके कुछ समय पश्चात ही 8 अगस्त 1942 को अखिल भारतीय कांग्रेस की बैठक ग्वालिया टैंक (मुंबई) में हुई। ग्वालिया टैंक,  अगस्त क्रांति मैदान के नाम से भी जाना जाता है। इस बैठक के दौरान गांधीजी ने 70 मिनट का भाषण दिया। इस भाषण के दौरान गांधीजी ने कहा कि जब भी सत्ता मिलेगी तो भारत के लोगों को मिलेगी और वह तय करेंगे कि इसे किसे सौंपा जाए। यह भाषण इतना प्रभावी था कि भारतीय जनता में एक नए जोश का संचार कर दिया। इसी भाषण के दौरान गांधीजी ने “करो या मरो” का नारा दिया था। इस नारे का साफ़ मतलब था कि आजादी के लिए अब हद से गुजरना पड़ेगा।

“भारत छोड़ो” का नारा युसूफ मेहर अली ने दिया था, जो एक अग्रणी स्वतंत्रता सेनानी थे। हमेशा से अहिंसा के पुजारी रहने वाले गांधी जी को जब लोगों ने ऐसे अवतार में देखा तो उन्हें समझ में आ गया कि अब  साम्राज्यवाद पर अंतिम प्रहार जरूरी है।

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भारत छोड़ो आंदोलन का प्रारंभ

8 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन की बैठक के पश्चात अगले दिन से आंदोलन प्रस्तावित था। अंग्रेजी सरकार भी इन कदमों से अच्छी तरह वाकिफ थी उन्होंने आधी रात को ऑपरेशन जीरो ऑवर के तहत सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया जिनमें प्रमुख थे मौलाना आजाद, कस्तूरबा गांधी, सरोजिनी नायडू। गांधीजी को भी आगा खां पैलेस में नजरबंद कर दिया गया। कांग्रेस को गैर-संवैधानिक संस्था घोषित कर दिया गया।

इन सब के बावजूद आखिरकार 9 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन का प्रारंभ हुआ। भारत छोड़ो आंदोलन को अगस्त क्रांति के नाम से भी जाना जाता है। यह आखिरी महान लड़ाई करो या मरो के नारे से प्रारंभ हुई। भारत छोड़ो आंदोलन के समय लार्ड लिनलिथगो भारत में वायसराय था।

जब सभी प्रमुख नेता गिरफ्तार कर लिए गए तो जनता अलग-अलग टुकड़ों में उन्हीं में से किसी के नेतृत्व से आंदोलन में जुट गई। इस प्रकार यह आंदोलन स्वत; स्पूर्त आंदोलन बना। गांधी जी ने 8 अगस्त को ही सभी वर्गों को दिशा निर्देश जारी कर दिए गए थे। यह दिशानिर्देश थे-

  • सरकारी कर्मचारी–  सेवा से त्यागपत्र ना दे परंतु कांग्रेस से अपनी निष्ठा घोषित करें एवं सभी कामकाज ठप कर दें।
  • सैनिक- सैनिकों से अनुरोध किया गया कि वह अपने देशवासियों पर गोली चलाने से इंकार कर दे परंतु ऐसा कुछ हुआ नहीं।
  • छात्र- अगर आजादी तक लड़ने का साहस हो तो ही पढ़ाई छोड़े अन्यथा आंदोलन से दूर रहे।
  • राजा महाराजा- राजा महाराजाओं से अनुरोध किया गया कि वह जनता को सहयोग करें एवं जनता की संप्रभुता स्वीकार करें।

आंदोलन के दौरान जनता सरकारी दफ्तर, पुलिस थाने, पोस्ट ऑफिस की तरफ कुच कर गई एवं उन पर कब्जा कर लिया गया। उत्साही जनता ने हड़ताल, प्रदर्शन, जुलूस प्रारंभ कर दिए। अंग्रेजी सरकार ने लोगों के ऊपर पूर्ण दमन की नीति अपनाते हुए लाठीचार्ज, गोलीबारी कि इससे लोगों का प्रदर्शन हिंसक हो गया। लोगों के द्वारा रेल की पटरियां उखाड़ दी गई , तोड़फोड़, मारपीट , डाक-तार व्यवस्था अस्त-व्यस्त कर दी गई।

9 अगस्त 1942 को ही अरुणा आसफ अली द्वारा ग्वालिया टैंक मुंबई पर तिरंगा  फ़हरा दिया गया। 11 अगस्त 1942 को पटना के छात्रों के समूह ने सचिवालय पर तिरंगा फ़हरा दिया। इससे गुस्साई सरकार ने गोलीबारी के आदेश दिए जिससे 7 छात्र शहीद हो गए।

लम्बे समय तक पुलिस एवं जनता के मध्य जबरदस्त संघर्ष देखने को मिला। कुछ ही महीनों में हजारों लोग जेल में डाल दिए गए कई लोग मारे गए। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भारत के कई हिस्सों में अंग्रेजी शासन के खिलाफ लोगों ने समानांतर सरकारों का गठन कर दिया।

सबसे पहले समानांतर सरकार का गठन बलिया (उत्तर प्रदेश) में चित्तू पांडे के नेतृत्व में हुआ। इसके अलावा मिदनापुर (तामलुक) बंगाल में  दिसंबर 1942 से सितंबर 1943 तक चलने वाली जातीय सरकार का गठन हुआ।  सतारा में वाई. बी. चव्हाण और नाना पाटील के नेतृत्व में प्रति सरकार का गठन हुआ। 

अंग्रेजी सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद कई राष्ट्रीय नेता गिरफ्तार नहीं किए जा सके। राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन, सुचिता कृपलानी आदि नेताओं ने भूमिगत रहकर भारत छोड़ो आंदोलन का नेतृत्व किया। उषा मेहता जिन्होंने रेडियो के माध्यम से एक नई क्रांति लाई उन्हें कांग्रेस रेडियो के नाम से जाना जाता है। यह एकमात्र ऐसा आंदोलन था जिसमें समाज के हर तबके ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। भारत छोड़ो आंदोलन में महिलाओं का योगदान भी प्रशंसनीय था।

महात्मा गांधी का रुख

दोस्तों भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब गांधीजी नजरबंद थे तब पूरे देश में हिंसक घटनाये हुई, कई लोग मारे गए। इन सब का हवाला देकर ब्रिटिश सरकार ने गांधी जी को जो अहिंसा के पुजारी थे, सार्वजनिक रूप से हिंसा की निंदा करने को कहा। परंतु महात्मा गांधी ने इसके लिए साफ साफ इनकार कर दिया था क्योंकि गांधीजी जान चुके थे कि अगर वो असहयोग आन्दोलन के जैसे पीछे हटते है तो भारत का गुलामी की जंजीरों से निकल पाना नामुमकिन होगा। यही ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने का सबसे सुनहरा मौका है।

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मुस्लिम लीग का रवैया

मित्रों यह हमारे देश का दुर्भाग्य था कि भारत छोड़ो जैसे बड़े स्वतंत्रता आंदोलन में मुस्लिम लीग का योगदान नहीं रहा। मुस्लिम लीग 30 दिसंबर 1906 को ढाका में स्थापित हुई थी। मुस्लिम लीग मुखिया जिन्ना का बस एक ही लक्ष्य था  पाकिस्तान का निर्माण करना । पाकिस्तान प्रस्ताव 1940 में पारित हुआ था।

भारत छोड़ो आंदोलन के प्रभाव और परिणाम

इस आंदोलन ने भारत को स्वतंत्रता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस आन्दोलन से भारत को अंतरराष्ट्रीय जनमत प्राप्त हुआ कई देश भारत की आजादी के पक्षधर थे।  इस आंदोलन ने पहली बार अंग्रेजी सरकार के प्रति जनता की इतने बड़े स्तर पर जागृति उत्पन्न की। इस आंदोलन के उपरांत तोड़फोड़ एवं हिंसा से हुए नुकसान से उबरकर अंग्रेजी शासन का पुनर्निर्माण करना काफी मुश्किल हो गया था। सरकार को मालूम हो चुका  था  की वो आगे भारतीयों की मदद के बिना सरकार नहीं चला पाएंगे।

इस लंबे समय तक चले आंदोलन में बहुत जन-धन की हानि हुई।  हजारों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी अंग्रेजी सरकार को भी अपने कई बड़े अधिकारी खोने पड़े। भारत छोड़ो आंदोलन ने भारत में  ब्रिटिश सरकार की जड़े कमज़ोर कर दी।

निष्कर्ष

दोस्तों भारत छोड़ो आंदोलन ने भारत के स्वतंत्रता के दरवाजे खोल दिए। प्रारंभ से अंग्रेजी सरकार भारतीय नागरिकों के सहयोग से ही सरकार चला रही थी जब आंदोलन के दौरान लगभग हर भारतीय ने सरकार का साथ छोड़ने का फैसला किया तो अंग्रेजों के लिए आगे शासन करना नामुमकिन सा हो गया था। अंग्रेजो की संख्या भारत में लगभग 2  से  2.5  लाख ही होगी जो मात्र भारतीयों के सहयोग से ही शासन चला पा रहे थे।

भारत छोड़ो आंदोलन को सभी जगह पढ़ाया जाता है की ये आंदोलन असफल हुआ था लेकिन अगर गहराई से विचार किया जाये तो किसी की देश को स्वतंत्रता प्राप्त करने के आवश्यक है की वहां की जनता परतंत्रता का सम्पूर्ण प्रतिकार करे जो इस आंदोलन ने भारत को प्रदान किया।  

गांधी जी जब से भारत के स्वतंत्रता मिशन में शामिल हुए उन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए अहिंसा का रास्ता अपना रखा था। उनके किसी भी आन्दोलन से अंग्रेजी हुकूमत को कोई ज्यादा नुकसान नहीं हुआ। जब भारत में गाँधी जी के आवाह्न पर असहयोग आंदोलन चल रहा था तब 5 फरवरी 1922 को चोरी-चोरा कांड में 22 पुलिसकर्मियों की हत्या के पश्चात ही गांधी जी ने असहयोग आंदोलन को रद्द कर दिया था। उन्होंने कहा मेरे आंदोलन में हिंसा की बिलकुल जगह नहीं है। लेकिन समय के अनुसार भारतीय जनता समझ चुकी थी जो मसाल भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस ने जलाई थी अब उसे अंतिम रूप देने का समय आ चुका है। 

 

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