भगत सिंह – महान क्रांतिकारी का जीवन परिचय

आप और हम आज जिस आजाद भारत में सांस ले रहे हैं उसकी आजादी की एक-एक बूंद भगत सिंह जैसे वीरों के रक्त से सींची गई है। भगत सिंह जिन्होंने छोटी सी उम्र में वह काम कर दिखाया जो आज की स्वार्थी दुनिया की सोच से भी परे है। तो आइए भगत सिंह की जीवनी एवं विचारों पर रोशनी डालते हैं। Bhagat Singh History in HIndi

भगत सिंह का प्रारंभिक जीवन

भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर 1960 में बंगा, लायलपुर जिला ब्रिटिश भारत के पंजाब में हुआ था। यह जगह वर्तमान में पाकिस्तान में है। भगत सिंह की माता का नाम विद्यावती कौर और पिता सरदार किशन सिंह संधू थे। भगत सिंह के चाचा सरदार अजीत सिंह थे जो एक क्रांतिकारी थे। भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह और स्वान सिंह दोनों भारत के आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे। इनका प्रभाव भगत सिंह के जीवन पर भी पड़ा। प्रारंभ से ही भगत सिंह के मन में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध रोष उत्पन्न हो चुका था।

जलियांवाला बाग हत्याकांड से उत्पन्न रोष

मित्रों 13 अप्रैल 1919 को लोग वैशाखी मनाने के लिए जलियांवाला बाग में इक्कठे हुए थे। इस दौरान कुछ लोग शांतिपूर्ण तरीके से रोलेट एक्ट के विरोध में एक बैठक का भी आयोजन कर रहे थे। इस को देख गरमाये जनरल डायर ने बिना किसी पूर्व सूचना के लोगों पर गोली चलाने के आदेश दे दिए। इसमें एक हजार से ज्यादा लोग मारे गए।

इस घटना के बारे में सुनकर भगत सिंह कई मील पैदल चलकर जलियांवाला बाग पहुंचे और वहां से रक्त से सनी मिट्टी अपने साथ लेकर अपने घर वापस लौट आए। भगत सिंह का अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ ओर रोष बढ़ गया और उन्होंने इनकी मौत का बदला लेने की प्रतिज्ञा की। उस समय भगत सिंह की उम्र मात्र 12 वर्ष की थी, इस आयु में ऐसा जज्बा आश्चर्य की बात है।

इससे पहले भी भगत सिंह अपने पिता के साथ जब खेत गए हुए थे तो भगत सिंह ने अपने पिता को बीज बोते देखा तो उन्होंने बंदूक बोने की बात कही। इससे उनके पिता को भी बहुत आश्चर्य हुआ कि इतना छोटा बच्चा इतना क्रांतिकारी कैसे हो सकता है। उनके पिता ने जब भगत सिंह की शादी के बारे में बात की तो भगत सिंह का जवाब आया “दुल्हन मेरी दुल्हन ना होगी आजादी मेरी दुल्हन होगी”।

भगत सिंह और गांधीजी

होनहार भगत सिंह प्रारंभ से ही गांधी जी के विचारों से अत्यंत प्रभावित थे। लाहौर में नेशनल कॉलेज की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह 1920 में गांधी जी द्वारा चलाए जा रहे असहयोग आंदोलन में भाग लेना प्रारंभ कर दिया और विदेशी सामानों का बहिष्कार करने में जुट गए। असहयोग आंदोलन से भगत सिंह को लगा कि अब तो आजादी मिलने वाली है। वह इस खुशी में झूमते, नाचते और गाते थे।

भगत सिंह की सक्रिय भूमिका

चौरी चौरा कांड के उपरांत गांधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन बंद किए जाने से भगत सिंह को आघात लगा। भगत सिंह ने स्वयं सक्रिय क्रांतिकारी की भूमिका में आने का फैसला किया। अक्टूबर 1924 में कानपुर में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन(HRA) की स्थापना की गई। इसकी स्थापना करने में राम प्रसाद बिस्मिल, योगेश चंद्र चटर्जी, सचिन सान्याल प्रमुख थे। इस संस्था की बाद में भगत सिंह ने भी सदस्यता ग्रहण की। तत्पश्चात भगत सिंह ने क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेना प्रारंभ कर दिया।

हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन द्वारा 9 अगस्त 1925 को सहारनपुर-लखनऊ लाइन पर काकोरी गांव में ट्रेन को रोककर रेल विभाग के खजाने को लूट लिया गया। अंग्रेजी सरकार ने इसके अंतर्गत काकोरी षड्यंत्र का मुकदमा चलाया। काकोरी षड्यंत्र के आरोप में राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेंद्र लाहिड़ी और रोशन सिंह को फांसी दे दी गई। चंद्रशेखर आजाद फरार हो गए। इस घटना से उत्तरी भारत में क्रांतिकारियों को बड़ा आघात लगा जिससे क्रांतिकारी आंदोलन थोड़े दिनों तक धीमे पड़ गए।

नौजवान भारत सभा

भगत सिंह एवं भगवतीचरण वोहरा के प्रयासों से 1926 में नौजवान भारत सभा का गठन किया गया। इसमें नौजवानों एवं विद्यार्थी को एक मंच पर लाकर संगठित करने का प्रयास किया गया। इसके अतिरिक्त भी भगत सिंह ने कई क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया और उनके दलों की सदस्यता ली।

क्रांतिकारियों का पुनः उदभव

भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में कुछ लोगों के साथ मिलकर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन को पुुनः संगठित करने का कार्य प्रारंभ किया। दिसंबर 1928 में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में समाजवाद का लक्ष्य निर्धारित किया गया। समें हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का नाम बदलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) कर दिया गया।

सांडर्स हत्याकांड

1928 में साइमन कमीशन के विरोध में एक विरोध प्रदर्शन किया जा रहा था। इस प्रदर्शन का नेतृत्व लाला लाजपत राय कर रहे थे। इस दौरान गुस्साए सहायक पुलिस कप्तान सांडर्स ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज का आदेश दिया लाठीचार्ज के दौरान लाला लाजपत राय घायल हो गए। फलस्वरुप उनकी 15 नवंबर 1928 को मृत्यु हो गई।

चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह और राजगुरु ने सांडर्स को लाला लाजपत राय की मौत का जिम्मेदार माना। उन्होंने सांडर्स की हत्या का खाका तैयार किया। आखिर में इन तीनों ने 17 दिसंबर 1928 को सांडर्स की गोली मारकर हत्या कर दी।

सांडर्स की हत्या को इन शब्दों में उचित करार दिया गया  “देश के करोड़ों लोगों के सम्मानीय नेता की एक साधारण पुलिस अधिकारी के क्रूर हाथों द्वारा की गई हत्या………… राष्ट्र का घोर अपमान है। भारत के देशभक्त युवाओं का यह कर्तव्य है कि वह इस कायरता पूर्ण हत्या का बदला ले। हमें सांडर्स की हत्या का अफसोस है किंतु वह उस अमानवीय व्यवस्था का अंग था जिसे नष्ट करने के लिए हम संघर्ष कर रहे हैं।”

सांडर्स की हत्या के पश्चात आरोपियों की तलाश प्रारंभ हो गई। भगत सिंह ने अपनी पहचान छुपाने के लिए अपनी दाढ़ी मूछ कटवा ली। इस प्रकार भगत सिंह ने सांडर्स को मौत के घाट उतारने में अहम भूमिका अदा की।

केंद्रीय विधानसभा में बम विस्फोट

हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ने सांडर्स हत्या कांड के पश्चात जनता को यह समझाने का प्रयास किया कि उनका उद्देश्य अब जनक्रांति में विश्वास रखता है ।भगत सिंह एवं उनके साथियों को समझ आ चुका था की इस ब्रिटिश सरकार को सुनाने के लिए अब कुछ अलग करना होगा।

अंग्रेज सरकार भारतीयों विशेषकर मजदूरों के अधिकारों पर प्रतिबंध लगाने के उद्देश्य से “ट्रेड डिस्प्यूट बिल” तथा “पब्लिक सेफ्टी बिल” पास करने की योजना बना रही थी। इसी का विरोध प्रदर्शन करने के उद्देश्य से भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने विधानसभा में बम फेंकने की योजना बनाई। इस योजना का उद्देश्य किसी की हत्या करना नहीं था अपितु बहरी हो चुकी अंग्रेजी सरकार को सुनाना था। इसलिए जानबूझकर एक मामूली सा बम बनाया गया ।

8 अप्रैल 1929 को  भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केंद्रीय असेंबली में खाली सीटों पर बम फेंका और अपने साथ लाये पर्चे हवा में उछाल दिए। बम फूटने से उठे धुएं में वे आसानी से भाग सकते थे परंतु भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त भागे नहीं और वहां इंकलाब-जिंदाबाद के नारे लगाते रहे। भगत सिंह एवं बटुकेश्वर दत्त को गिरफ्तार कर लिया गया।

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त असेंबली से भागे क्यों नहीं

भागने का मौका होने के बावजूद ना भागने के पीछे कुछ मुख्य कारण थे। उस समय जनता में धारणा बनती जा रही थी कि क्रांतिकारी अपनी आतंकवादी गतिविधियों के पश्चात स्वयं तो बच निकलते हैं परंतु जनता को सरकारी दमन की सजा भुगतनी पड़ती है। उन्होंने यह पैगाम भी दिया कि आजादी के सामने उनकी जिंदगी की कुछ कीमत नहीं है और वह इसके लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।

अंग्रेजों की कार्यवाही और भगत सिंह की सजा

अंग्रेजी सरकार ने चंद्रशेखर आजाद को छोड़कर बाकी सब क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया। भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव के खिलाफ लाहौर षड्यंत्र के तहत मुकदमा चलाया गया। अन्य क्रांतिकारियों को भी कड़ी सजा सुनाई गई।

जेल में भी भगत सिंह ने देखा कि अंग्रेजी सरकार के द्वारा भारतीय एवं अंग्रेजी कैदियों में भी भेदभाव किया जा रहा है। वहां भी इसके खिलाफ भगत सिंह ने मोर्चा खोला। भगत सिंह ने जेल की सुविधाओं में सुधार एवं समानता के लिए अपने साथियों के साथ जेल में ही अनशन प्रारंभ कर दिया। भगत सिंह में अपने साथियों के साथ जून 1929 में भूख हड़ताल प्रारंभ कर दी। 64 दिन की भूख हड़ताल के कारण जतिन दास उर्फ यतींद्र नाथ दास की मृत्यु हो गई। इस प्रकार जतिन दास जेल में पहले शहीद बने। आखिरकार अंग्रेजी सरकार को भगत सिंह के आगे झुकना पड़ा और उनकी सभी मांगे स्वीकार करनी पड़ी।

भगत सिंह को फांसी की सजा

भारतीय दंड संहिता की धारा 129, 302 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4 एवं 6फ और आईपीसी की धारा 120 के अंतर्गत भगत सिंह दोषी करार दिए गए। आखिरकार 7 अगस्त 1930 को 68 पन्नो के निर्णय द्वारा भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा सुनाई गई। सजा सुनाने के उपरांत तुरंत ही लाहौर में हिंसा भड़कने के डर से धारा 144 लगा दी गई।

जब फांसी के लिए भगत सिंह को बुलाने आया गया तब वह लेलिन की किताब पढ़ रहे थे। जब उन्हें चलने के लिए कहा गया तो भगत सिंह ने कहा “पहले एक क्रांतिकारी को दूसरे क्रांतिकारी से मिल लेने तो दो”। इसके पश्चात थोड़ी देर में उन्होंने अपनी किताब हवा में उछाल कर कहा “अब चलो”।

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव अपनी फांसी के समय हंसते-गाते हुए जा रहे थे। उनकी जुबान पर ”मेरा रंग दे बसंती चोला” गाना था। उनके चेहरे पर मृत्यु का जरा भी भय नहीं था। इन तीनों की फांसी की तारीख 24 मार्च 1931 को तय की हुई थी परंतु जनता के आक्रोशित होने के डर से  23 मार्च 1931 को शाम 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी गई। इससे पूरा भारत स्तब्ध रह गया और जनता में व्यापक रोष उत्पन्न हो गया।

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क्या गांधी जी ने भगत सिंह की फांसी रुकवाने का प्रयास किया था

दोस्तों आपने कई लोगों को गांधी जी के ऊपर आरोप लगाते हुए देखा होगा कि अगर गांधीजी चाहते तो भगत सिंह की फांसी रुक जाती है। सबसे पहले महत्वपूर्ण बात यह थी कि भगत सिंह ही नहीं चाहते थे कि उनकी फांसी रुके। उन्हें जनता को एक संदेश देना था की हमे हमारे सीने में आजादी की मशाल जलानी है।

5 मार्च 1931 में गांधी-इरविन समझौता हुआ। इससे लोगों की उम्मीद थी कि गांधीजी भगत सिंह की सजा माफ करवा देंगे। उस समय के कई अखबारों एवं लेखों में यह लिखा गया है कि गांधीजी अंतिम समय तक भगत सिंह की फांसी माफ करवाने का प्रयत्न कर रहे थे। परंतु इरविन ने स्पष्ट किया कि वह भगत सिंह की सजा माफ नहीं करवा सकते हैं।

अंग्रेजी सरकार जानती थी कि भगत सिंह सांडर्स की हत्या का आरोपी है अगर उनकी सजा माफ कर दी जाएगी तो युवाओं को गलत संदेश जाएगा और वह आगे भी ऐसा करने का प्रयास कर सकते हैं। वह इस फांसी के द्वारा युवाओं को संदेश देना चाहते थे कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जो भी खड़ा होगा उसका यही हश्र होगा। अगर दोस्तों उस समय भगत सिंह की फांसी रुक भी जाती तो क्या उन्हें आज वह तवज्जो मिलती? कुछ शख्सियत ऐसी ही होती है जो अपनी छोटी सी उम्र में वह काम कर जाती है जिसकी आने वाले कई सालों तक मिसाले दी जाती है।

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भगत सिंह का व्यक्तित्व

भगत सिंह बचपन से ही किताबें पढ़ने के काफी शौकीन थे। उन्होंने बहुत ही कम उम्र में सैकड़ों किताबें पढ़ डाली थी। भगत सिंह वैसे तो नास्तिक थे परंतु उन्होंने भगवत गीता का भी अध्ययन किया था। भगत सिंह को हिंदी, उर्दू, पंजाबी, बांग्ला व अंग्रेजी भाषाओं का ज्ञान था। जेल में भी उन्होंने कई किताबें पढ़ी और कई लेख लिखे। उन्होंने “मैं नास्तिक क्यों” पर भी एक लेख लिखा। इस प्रकार भगत सिंह एक महान विचारक, लेखक, कलम के धनी, निडर और निर्भय व्यक्तित्व वाले थे। भगत सिंह एक उम्दा कलाकार भी थे उन्होंने स्कूल के दौरान कई नाटकों में भाग लिया था। इसके अतिरिक्त वे फिल्में देखने के भी बहुत शौकीन थे।

कम उम्र में इतना ज्ञान प्राप्त करके वह समझ गए थे कि आजादी से बढ़कर कुछ नहीं है। उन्होंने बदलाव के लिए कुछ कर गुजरने की ठानी। भगत सिंह का अंदाज निराला था। कोर्ट ट्रायल में उनका मजाकिया अंदाज सबका मन मोह लेने वाला था। भगत सिंह ने अंग्रेजी सरकार को एक पत्र लिखा और इच्छा जताई थी कि उन्हें अंग्रेजी सरकार के खिलाफ भारतीय युद्ध बंदी समझकर गोली से उड़ा दिया जाए। परंतु अंग्रेजी सरकार ने इसे ठुकरा दिया। इस प्रकार उनमे एक वीर क्रांतिकारी के सभी गुण मौजूद थे।

निष्कर्ष

दोस्तों भगत सिंह का जीवन हमें शिक्षा प्रदान करता है की हमें जीवन किस प्रकार जीना चाहिए। भगत सिंह ने अपनी छोटी सी उम्र में अपना लक्ष्य निर्धारित कर लिया था। अपनी मृत्यु पर जरा भी डर ना था। मात्र 23 वर्ष की उम्र में मृत्यु ने भगत सिंह का वरण कर लिया और आने वाली पीढ़ियों को स्वतंत्रता की राह दिखाई। भगत सिंह की जीवनी हम लोगो के लिए एक प्रेरणा है। शत-शत नमन ऐसे शहीद-ए-आजम भगत सिंह को।

दोस्तों आप भगत सिंह के बारे में अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में बता सकते है।

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