बलात्कार – क्यों और कब तक?

हमारे विश्व गुरु भारत देश में बलात्कार के नित नए मामले सामने आते हैं। बलात्कार ने मानव सभ्यता के विकास को झुठला दिया है जिसमें मानवीय गरिमा को सबसे ऊपर माना गया है। आज मैं बलात्कार जैसे जघन्य अपराध पर विस्तार से विश्लेषण करूंगा। अगर मेरी कोई बात आपको अच्छी ना लगे तो उसके लिए मुझे क्षमा करें।

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बलात्कार क्या हैं

मैं इसे किसी परिभाषा के माध्यम से समझाने का प्रयास नहीं करूंगा। यह शब्द अपने आप में मानवता से कोसों दूर है। बलात्कार में सिर्फ शारीरिक बल द्वारा किया गया यौन दुराचार ही शामिल नहीं होता अपितु इसमें अन्य कारण भी आते हैं जिसके दबाव में यह किया जा रहा होता है। दरअसल बलात्कार में कुछ सामान कारण और कुछ भिन्न-भिन्न कारण होते हैं। जिनके बारे में हम आगे विचार करेंगे।

हालिया संदर्भ

हाल ही में हाथरस, उन्नाव, हैदराबाद, हरियाणा, बस्तर और मणिपुर की बलात्कार की घटनाएं समान कारणों से नहीं हुई लगती है। इनमें से कई घटनाएं परिवार के किसी सदस्य जैसे पिता, मामा, चाचा आदि द्वारा ही की गई है। यहां बलात्कार का अर्थ कुछ अलग ही समझ की मांग करता है। ठीक वैसे ही अमीर व्यक्ति द्वारा गरीब महिला का बलात्कार या गरीब व्यक्ति द्वारा अमीर महिला का बलात्कार। इन सब में बलात्कार के अलग-अलग कारण एवं अर्थ दिखाई पड़ते हैं।  

ऐसा नहीं है कि बलात्कार मात्र महिलाओं या बच्चियों के साथ ही होता है। यह ट्रांसजेंडर, छोटी उम्र के लड़कों, यहां तक कि पशुओं के साथ भी होता है। यह अलग-अलग श्रेणी के अपराध स्पष्ट करते हैं कि बलात्कार का मूल कारण यौन इच्छा ही नहीं अपितु कुछ अन्य कारण भी है। तो आइए इसके कारणों को समझने का प्रयास करते हैं।

सामाजिक पहलू

सामाजिक कारणों में कुछ महत्वपूर्ण कारण है जो निम्न प्रकार से हैं-

पितृसत्तात्मक समाज

पितृसत्ता से अभिभूत राज्यों उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, पंजाब में सर्वाधिक बलात्कार के मामले देखे जाते हैं। यहां समाज एवं संस्कृति का मूल मसला है। बच्चों की परवरिश ही लिंग भेद के आधार पर की जाती है। लड़कों को प्रारंभ से ही बंदूक, तलवार जैसे मर्दाना खिलौने दिए जाते हैं। उनके साहस और शारीरिक मजबूती की प्रशंसा की जाती है। संवेदनशील और विनम्रता पूर्ण लड़कों का उपहास किया जाता है। इन्हीं कारणों से लड़कों में यौन आक्रमण के बीज बचपन से ही पड़ जाते हैं।

दूसरी ओर लड़कियों को मात्र घर के कार्यों के लिए प्रोत्साहित किया जाता है जबकि लड़के को इन कार्यों से दूर रखा जाता है। उसके लिए कार्य करने के लिए पहले बहन और मां होगी बाद में उसकी पत्नी।

लड़की को वस्तु समझना

असमान परवरिश के कारण लड़का उसके पिता की गुलामी झेलने वाली मां की तरह पत्नी के रूप में स्वयं के लिए गुलाम की खोज करता है। लड़का शादी करने के लिए भी तलवार लटका कर और घोड़ी पर बैठकर ऐसे जाता है जिसे कोई युद्ध या अपरहण करने जा रहा हो। कहने को उचित नहीं परंतु लड़की के मां-बाप भी कन्यादान ऐसे करते हैं जैसे कोई वस्तु का दान कर रहे हो। पति ने आर्थिक सुरक्षा के नाम पर अब पत्नी के शरीर को भोगने का लाइसेंस प्राप्त कर लिया होता है। पत्नी का बलात्कार पति का दैनिक और विवाह से प्राप्त अधिकार बन जाता है। जब लंबे समय से महिलाओं के लिए संचित दृष्टिकोण सड़कों पर उतरता है तो बलात्कार कहलाता है।

आस पड़ोस का वातावरण

आपको सुनकर शायद आश्चर्य हो लगभग 90% से ज्यादा रिपोर्टेड बलात्कार घर के भीतर या आस पड़ोस में होते हैं। यह वारदातें तात्कालिक यौन तनाव का परिणाम ना होकर एक लंबी योजना का परिणाम होती है। इनमें से अधिकतर मामले सामने नहीं आ पाते क्योंकि शिकायत करने पर महिलाओं को ही नुकसान होता है। महिला पति के घर से बेदखल होने के डर से विवश होती है और परिवार जैसी संस्था पर आश्रित रहती है। चाहे फिर उस संस्था में शोषण की वैधता ही क्यों ना हो। हमारा समाज ऐसी लड़की की परवरिश करता है जो अपने पति के लायक बन सके। यह समाज लड़की को उसके तन से पवित्र मानता है ना कि उसके मन से।

माता पिता और पति

लड़की अधिकांश मामलों में अपने माता-पिता के लिए एक जिम्मेदारी होती है। लड़कियों के लिए न तो कोई सामाजिक सुरक्षा है ना कोई शिक्षा और ना ही कोई पैतृक संपत्ति में हिस्सा। यह सभी कारण एक महिला को दुर्बल बनाने के लिए पर्याप्त हैं। फिर हम ऐसा करके महिलाओं को सशक्त बनाने की बाते करते हैं।  बलात्कार के मामलों में अधिकांश मामले सामने नहीं आ पाते क्योंकि वो उन्हीं पुरुषों द्वारा किए जाते हैं जिनका कार्य महिला को सुरक्षा की गारंटी देना है।

दमनात्मक कार्यवाही के रूप में बलात्कार

दमनात्मक कार्यवाही का मतलब हुआ कि किसी परिवार या समूह को नीचा दिखाना या बदला लेना। यहां दी जाने वाली गालियां भी दूसरों की मां और बहन के बलात्कार से संबंधित होती है। देखा जाए तो महिलाओं की यौन सुचिता उस घर की इज्जत के प्रतीक के रूप में बना दी गई है। जिसका सीधा संबंध किसी परिवार या समुदाय की इज्जत उड़ाने के लिए उनकी औरतों का बलात्कार करना सबसे सरल उपाय माना गया है। यह मैं नहीं कह रहा हूं भागलपुर का मामला, फूलन देवी रेप केस, साबरकांठा का मामला कह रहा हैं। यहां देखा जाए तो यौन प्रबलता का मामला ना होकर मामला दमन का प्रतीत होता है। ऐसे में दूसरे समुदायों में भय उत्पन्न करने के उद्देश्य से महिलाओं के अंग भंग कर दिए जाते हैं जो दिल दहलाने वाले होते हैं। यहां सॉफ्ट टारगेट के रूप में महिलाओं को चुना जाता है।

यौन आक्रामकता की भूमिका

बलात्कार के मामलों में यौन आक्रामकता की भूमिका सर्वाधिक है। किसी भी समाज में उत्पन्न यौन इच्छाओं और उनकी पूर्ति के साधनों में संतुलन होना अति आवश्यक है। यदि पूर्ति के साधनो में कमी आती है तो फलस्वरुप यह बलात्कार का रूप धारण करता है। इसमें भी निम्न वर्ग का अनुपात अधिक होता है जो अपनी आवश्यकताओं की संतुष्टि पैसों के अभाव में नहीं कर पाते हैं। इंटरनेट पर उपलब्ध पोर्न को देखकर युवा भ्रमित हो रहे है जो उन्हें मानसिक रूप से कमजोर और बीमार बना रहा है।  

विवाह की उम्र बढ़ना

अपना कैरियर बनाने की प्रतिस्पर्धा में विवाह की औसत उम्र लगातार बढ़ती जा रही है जिससे इन युवाओं को एक अंतर्विरोध का सामना करना पड़ रहा है। इस कसमकस में कई युवा गुम होकर गलत कदम उठा लेते हैं।  

इंटरनेट और टीवी की भूमिका

आज के इंटरनेट के युग में पोर्न की सहज उपलब्धता युवाओं को अपनी चपेट में ले रहा है। उसी के अनुरूप वे नए यौन अनुभवों की कल्पना में डूबे रहते हैं। इन साइट्स पर पोर्न देख-देख कर युवा अपने मन में प्रेयशियों की कल्पना प्रारंभ कर देते हैं। यहां तक की वह सड़क पर चल रही महिलाओं और लड़कियों में भी वही छवि खोजने का प्रयास करते हैं।

टीवी पर बिना किसी रूकावट के कुछ विशेष विज्ञापनों में लड़कियों का वस्तुकरण किया जाता है। जो लोगों के यौन इच्छाएं बढ़ाने का कार्य करते हैं। फिल्मों में कामुकता के दृश्य और आइटम सांग्स का भी इतना ही योगदान है। यह सभी धीरे-धीरे युवाओं के मन को प्रभावित करते हैं और उन पर समय के अनुसार हावी हो जाते हैं।

इच्छाओं की पूर्ति के विकल्प

हमारे समाज में जिस प्रकार से यौन इच्छाएं भयानक रूप से बढ़ रही है उसकी पूर्ति के विकल्पों में काफी असमानता है। मीडिया के जमाने में लोग जिस विज्ञापनीय सुंदरता के भोग के सपने देख रहे हैं ऐसी सुंदरता समाज के कम लोगों तक ही सीमित है। यहां एक नया पूंजीवाद पनपता है “सुंदरता का पूंजीवाद”। इसमें सबसे सुंदर लड़कियां सबसे अमीर और ताकतवर पुरुषों को उपलब्ध करवाई जाती है। आकर्षक सुंदर युवाओं के पास हमेशा मौका रहता है कि वह सुंदर लड़कियों से मित्रता कर अपनी कुंठा से मुक्त हो सके।

आजकल सेक्स एक उत्पाद के रूप में उपलब्ध है अमीर वर्ग के लोग अपनी पसंद से सुंदरता का चुनाव करके अपनी कुंठा से मुक्त हो सकते है। इसमें गरीब वर्ग भी मीडिया द्वारा सुंदरता के रचे गए जाल से बच नहीं पाता है। वे भी विज्ञापनीय सुंदरियों के सपने बुनते हैं परंतु वे उनकी पहुंच से कोसों दूर रहती है। हालांकि उनके वर्ग में भी सुंदरता होती है परंतु वह भी पूंजीवादी ताकतों द्वारा खींच ली जाती है। अंत में बचती है तो उनके पास कुंठा जो अंत में बलात्कार का रूप धारण करती है।

प्रवासन और असंतुलित विकास

कई लोग काम करने के लिए बड़े शहरों में पलायन करते हैं। उनकी कम कमाई के कारण वह अपने परिवार को साथ नहीं रख पाते हैं। इस कारण न तो उन्हें परिवार नसीब होता है ना कोई शांति। जो उन्हें अंत में नशे की ओर दखेलता है। शहरी चकाचौंध से उनमें तनाव, असंतोष और गुस्सा उत्पन्न हो जाता है । तंगी आर्थिक हालत की वजह से वे पंचतारा होटल्स की सुविधाये नही ले पाते।

आखिर में उन्हें गैरकानूनी रेड लाइट एरिया का सहारा लेना पड़ता हैं परंतु वहां भी उनके सपने संतुष्ट नहीं हो पाते। धीरे-धीरे और का मन उनके ऊपर हावी हो जाता है जब भी वह किसी आकर्षक महिला को देखते हैं तो उनका मन बहुत बुरी तरह कचोट जाता है। अंत में यह हैवानियत का रूप धारण करता है और मात्र यौन संतुष्टि तक सीमित नहीं रहता। बलात्कार के बहाने वह अपनी पिछली कुण्ठाओं को शांत करने का प्रयास करते हैं। उनकी देह को निचोडकर उनकी हर एक चीख के साथ वो अपनी हार का बदला लेते है।

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लचर कानून व्यवस्था

अपराध करने वाले व्यक्ति को भारतीय कानून व्यवस्था पर पूर्ण विश्वास होता है। उन्हें मालूम है कि कानून व्यवस्था उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। FIR से लेकर कोर्ट्स तक पूरी व्यवस्था लचर है। पुलिस व्यवस्था में भी पुलिस पीड़ित को समझा कर मामला रफा-दफा करने का प्रयास करती हैं। कोर्ट में भी घिसी-पिटी पुरानी दलीलें दी जाती है जिनका कोई मतलब नहीं रह जाता। जेनेवा के प्रसिद्ध विचारक रूसो के अनुसार महिला की मर्जी के बिना कोई उससे यौन संबंध नहीं बना सकता।

अमीर आरोपियों के वकीलों के सामने पीड़ित के वकील जो अधिकांश मामलों में सरकारी वकील होते है टिक नहीं पाते। यहां तक वकील बिक भी जाते हैं। पीड़िता को बलात्कार से ज्यादा लंबी कानूनी प्रक्रिया परेशान करती है। अपराधी अधिकतर मामलों में छूट जाता है और लड़की अन्य किसी दुर्घटना के डर में जीती रहती है। अदालतों में लंबे केस, न्यायाधीशों की कमी, हाई कोर्ट, फिर सुप्रीम कोर्ट और अंत में राष्ट्रपति। यह लंबी और लचर प्रक्रिया पर्याप्त होती है अपराधी को अपराध करवाने के लिए।

 

कैसे रोका जाए बलात्कार की घटनाओं को

बलात्कार की घटनाओं को रोकना किसी एक विशेष उपाय पर नहीं टिका है। मात्र कानून व्यवस्था द्वारा तो बिल्कुल भी नहीं। सभी उपायों को एक साथ लागू करके इस में कमी लाई जा सकती है।

फास्ट ट्रेक कोर्ट्स

यौन आक्रमण जैसे मामलों के लिए पूरे देश में फास्ट ट्रैक कोर्ट्स का निर्माण किया जाना चाहिए। जिसमें अधिक से अधिक महिला न्यायाधीशों की उपस्थिति पर जोर दिया जा सकता है।

केस निवारण के लिए समय का निर्धारण

फास्ट ट्रैक कोर्ट में अधिकतम किसी मामले के निपटान के लिए 3 महीने निश्चित किए जा सकते हैं। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में भी निश्चित समय निर्धारित किया जाना चाहिए। पीड़ित को बार बार अदालत आने की बाध्यता से दूर रखा जा सकता है। अगर हो सके तो उसके बयान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से लिए जा सकते हैं।

पुलिस प्रशासन की विशेष शाखाएं

यौन आक्रमण से संबंधित विशेष पुलिस ब्रांचों की स्थापना की जानी चाहिए। जहां महिला कर्मचारियों की संख्या ज्यादा हो। इन्हें विशेष प्रकार का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

कुछ विशेष उपाय

समाज के किसी भी अंग के लिए वेश्यावृत्ति को समाप्त करना लगभग असंभव है। आज भी यह गैरकानूनी होने के बावजूद धड़ल्ले से चल रही है। अगर इसे वैधता प्रदान कर दी जाए तो शायद बलात्कार के मामलों में कमी आए। इससे अन्य लाभ भी प्राप्त होगे जैसे दलालों द्वारा वेश्याओं को आर्थिक और देह शोषण से छुटकारा मिलेगा, बच्चों के मानवाधिकारों की रक्षा होगी आदि।

इसके अतिरिक्त प्लास्टिक के सेक्स टॉयज को वैधता प्रदान की जा सकती है। अगर किसी निर्जीव वस्तु के सहारे युवाओं की यौन संतुष्टि हो जाए तो बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों में जरूर कमी आएगी।

यौन शिक्षा

बच्चों को कक्षा 9 या 10 से ही सेक्स एजुकेशन प्रदान की जानी चाहिए। जिससे वे दूसरे व्यक्ति द्वारा किए गए गलत स्पर्श और यौन संकेतों को पहचानने में सक्षम हो पाए। इससे बच्चों में काफी जागरूकता बढ़ेगी।

वेब सीरीज और विज्ञापनों पर आवश्यक प्रतिबंध

आजकल वेब सीरीज में हद से ज्यादा हिंसा और यौन दृश्य दिखाए जाते हैं। विज्ञापन में भी लड़कियों का वस्तुकरण आम हो गया है। उनके लिए सेंसर बोर्ड जैसी विशेष संस्था होनी चाहिए जो इन पर आवश्यक प्रतिबंध लगा सके। इंटरनेट पर मौजूद लाखों पॉर्न साइट्स को बैन करने का प्रयास भी किया जाना चाहिए। जिससे युवाओं का नैतिक पतन होने से बचाया जा सके।

महिलाओं को शिक्षा और आर्थिक सुरक्षा

महिलाओं को पर्याप्त शिक्षा के लिए अधिक समुचित प्रयास किए जाने चाहिए। रोजगार परक शिक्षा से उनकी दूसरे पर निर्भरता कम होगी। स्कूल कॉलेजो में आत्म रक्षा के ऊपर प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाना आवश्यक है।

सामाजिक आर्थिक सुरक्षा बढ़ाने के लिए संपत्ति में अधिकार को अब गंभीरता से उठाने का समय आ गया है। इससे महिलाएं सशक्त होगी और प्रतिरोध कर सकेगी। जिससे अपराधों में स्वतः ही कमी आएगी।

आरोपियों को चुनाव लड़ने पर रोक

किसी भी चुनाव में उतरने वाले प्रत्याशी पर अगर सिद्ध बलात्कार के मामले हो तो उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगानी चाहिए। अगर ऐसे व्यक्ति चुनाव जीतकर सत्ता में आते हैं तो अपराधियों का अपराध करने का मनोबल ओर बढ़ जाता है। साथ ही यह समाज पर भी एक गलत प्रभाव छोड़ता है।

समाज का दृष्टिकोण

सामाजिक बदलाव अति आवश्यक है। पीड़िता को समाज में स्थान मिलना जरूरी है। उसके प्रति संवेदना का भाव होना चाहिए। अपराधियों का सामाजिक बहिष्कार किया जाना चाहिए। घर में बच्चों की परवरिश में समानता होनी अति आवश्यक है।

निष्कर्ष

बलात्कार वर्तमान में देश की एक गंभीर समस्या के रूप में खड़ा है। जिस प्रकार युवाओं का नैतिक पतन हो रहा है ये काफी चिंताजनक है। इसमें सुधार के लिए कानून व्यवस्था पर ही निर्भर न रहकर सामाजिक बदलाव की भी सशक्त आवश्यकता है। 

किसी के साथ घटना घटित होने पर मोमबत्ती लेकर प्रार्थना करना उतना ही सरल है जितना अपने बच्चों को नैतिक शिक्षा देना। अपराधों को कम करने का रास्ता सिर्फ स्त्रियां अकेले पार नहीं कर पाएगी। इसके लिए जरूरी है कि पुरुष उन अधिकारों को स्वेछा से छोड़े जो परंपरा ने स्त्रियों का हक मारकर उन्हें दिया है।

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