राजस्थान की सियासत, भारत में हुए सत्ता परिवर्तन

भारत जैसे एक लोकतांत्रिक देश में मतदाताओं द्वारा चुने गए प्रत्याशियों द्वारा सरकार चलाई जाती है लेकिन पिछले कुछ दशकों की घटनाओं को देखकर तो एक अलग ही स्थिति स्पष्ट होती है। भारतीय संविधान के अनुसार अल्पमत वाले राजनीतिक दल भी अन्य राजनीतिक दलों के सहयोग से बहुमत प्राप्त दल को पछाड़ कर अपनी सरकार बना सकते हैं। प्रत्यक्ष रूप से देखा जाए तो यह है निष्कर्ष सामने आता है कि बहुमत वाली पार्टी जिसे जनता ने चुना है वह तो वास्तव में शासन से बाहर है।


कैसे शुरू हुआ विवाद
 

दिसंबर 2018 में राजस्थान और मध्यप्रदेश में कांग्रेस को चुनाव में जीत मिली । दोनों राज्यों में दो युवा नेता मुख्यमंत्री बनने की होड़ में थे। लेकिन पार्टी प्रमुख राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी ने दोनों राज्यों में अनुभव के साथ ही गए। मध्यप्रदेश में कमलनाथ की सरकर बनी और राजस्थान में अशोक गहलोत ने 17 दिसंबर 2018 को 107 कांग्रेसी विधायकों के साथ राजस्थान के 12 वें मुख्यमंत्री के पद के रूप में शपथ ली।वर्तमान में राजस्थान में कुल 200 विधानसभा सीटें हैं। 

तात्कालिक समय में सचिन पायलट भी मुख्यमंत्री पद के लिए अशोक गहलोत के प्रतिद्वंद्वी थे। सचिन पायलट मुख्य मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल थे और राजस्थान की जनता भी एक युवा चेहरा तलाश रही थी। लेकिन पार्टी के अन्य शीर्ष नेताओं के समर्थन से गहलोत ही मुख्यमंत्री बने और पायलट को उप मुख्यमंत्री के पद के रूप में ही संतुष्ट होना पड़ा। प्रारंभ से ही दोनों के बीच में मुख्यमंत्री पद को लेकर विवाद रहा हैं। लेकिन दोनों ने अपने मतभेद पर कभी खुलकर बात नहीं की। 

जनवरी 2020 में कोटा जिले में बच्चों की मौतों पर भी लेकर दोनों के बीच अप्रत्यक्ष रूप कई बार तीखी बयान बाजी देखी गई।

अभी कुछ समय में राजस्थान में अवैध हथियारों एवं तस्करी के संबंध में SOG (Special Operation Group) द्वारा कॉल रिकॉर्डिंग की जा रही थी। इसी कॉल रिकॉर्डिंग में राजस्थान की सरकार गिराने एवं नया मुख्यमंत्री बनाने की बात पता का खुलासा हुआ। इस सब के दौरान मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट समेत कुछ अन्य व्यक्तियों को पूछताछ करने हेतु नोटिस भेजा गया। इससे सचिन पायलट की नाराजगी और बढ़ गई और राजस्थान की सियासत गरमा गई।

क्या हुआ इस दौरान

इस संबंध में अशोक गहलोत ने ट्वीट कर मीडिया पर निशाना साधा और इसको गलत ढंग से प्रस्तुत करने का आरोप लगाया। रिकॉर्डिंग के आधार पर कांग्रेस विधायक महेश जोशी ने SOG में विधायकों की खरीद-फरोख्त के संबंध में FIR दर्ज करवाई।

इन सबके बीच में चिंतित अशोक गहलोत ने अपने सभी विधायकों को इकट्ठा कर 12 जुलाई को एक मीटिंग ली। इस दौरान सभी विधायक जयपुर मे एक रिसोर्ट के अंदर रुके हुए हैं और वहां किसी की भी आवाजाही की मनाही है। आज यानी 14 जुलाई को अशोक गहलोत ने अपने विधायकों की एक और मीटिंग बुलाई है।  

भाजपा ने क्या कहा

भाजपा की केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावतने बयान जारी कर कहा है कि इस स्क्रिप्ट के राइटर, डायरेक्टर अशोक गहलोत ही है। अशोक गहलोत भाजपा के कंधे पर बंदूक रखकर गोली चला रहे हैं। 

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Sachin Pilot

 

कौन है सचिन पायलट (Who is Sachin Pilot)

सचिन पायलट दिवंगत कांग्रेस नेता राजेश पायलट के बेटे हैं। राजेश पायलट राजीव गाँधी के काफी करीब थे। इनकी मां का नाम रमा पायलट है। सचिन पायलट फारूक अब्दुल्ला के दामाद भी हैं। मात्र 26 साल की उम्र में 2004 में वह दौसा लोकसभा सीट पर निर्वाचित हुए। बाद में 2009 में भी वह अजमेर की लोकसभा सीट से चुनाव जीते। इसके बाद वो कैबिनेट मंत्री के पद पर भी रहे।इस प्रकार वह कांग्रेस की तरफ से एक युवा नेता की छवि मे उभरे।

2018 के चुनाव में वह मुख्यमंत्री पद के लिए प्रबल दावेदार थे परंतु उचित सपोर्ट नहीं होने की वजह से उन्हें उप मुख्यमंत्री पद से ही संतोष करना पड़ा। वो कुछ समय तक राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष रहे।    

राजस्थान की राजनीति में अटकलें

राजस्थान की राजनीति अभी उफान पर है। अभी भाजपा के पास 75 विधायक है अगर पायलट उनको समर्थन भी देते है तो उन्हें सरकार बनाने के लिए 25 विधायकों का और समर्थन चाहिए। लेकिन जिस तरह प्रारंभ में सचिन पायलट द्वारा दावा किया गया था कि उनके पास 30 विधायकों का सपोर्ट है वह अभी खोखला नजर आ रहा है। पायलट के समर्थित विधायक मानेसर,गुरुग्राम में रुके हुए है।

अभी हाल में ही राज्य से पायलट के पोस्टर और बैनर उतार दिए गए है,ये साफ़-साफ़ इशारा कर रहे है की पार्टी के आलाकमान ने पायलट को राजस्थान अध्यक्ष पद से हटाने का मन बना लिया है।

Updateकांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला के बयान के अनुसार सचिन पायलट को 14 जुलाई 2020 की दोपहर को उप मुख्यमंत्री एवं राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष के पद से हटा दिया गया हैं।

सचिन पायलट का बगावत करना और ज्योतिरादित्य सिंधिया की तरह बीजेपी का दामन थामना हाल फिलहाल संभव नही लग रहा। वैसे भी सियासत के जादूगर अशोक गहलोत राजनीति में काफी चतुर एवं निपुण है। वह आसानी से अपने हाथ से सत्ता नहीं जाने देंगे, और समीकरण भी यही बयां कर रहे है। वैसे अगर आने वाले समय मे सत्ता पलटती भी है और कोई नई पार्टी सरकार बनाती है तो भी यह कोई नई आश्चर्य की बात नहीं होगी। दोस्तों आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ तख्ता पलटा को-

कमलनाथ की सरकार का गिरना

राजस्थान में दिसंबर 2018 को सरकार बनने के साथ ही मध्य प्रदेश में भी कमलनाथ की कांग्रेस सरकार बनी। लेकिन कांग्रेस पार्टी के ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस पार्टी से दरकिनार किए जाने से नाराज होकर मार्च 2020 में कांग्रेस को छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया। इसके साथ ही वह कांग्रेस के विधायक तोड़ने में कामयाब हुए और मार्च 2020 में ही मात्र 15 महीने में ही कमलनाथ सरकार गिर गई। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में पुनः बीजेपी की सरकार बनी।

कर्नाटक के कुमार स्वामी की सरकार गिरी

23 मई 2018 को कांग्रेस एवं जेडीएस के समर्थन से कुमार स्वामी कर्नाटक के 18 वें मुख्यमंत्री बने। जुलाई 2019 में कांग्रेस के ही 13 विधायकों और उन्ही की पार्टी के 3 विधायकों ने MLA की पोस्ट से रिजाइन दे दिया। 23 जुलाई 2019 को कर्नाटक फ्लोर टेस्ट में बीजेपी को 105 और कांग्रेस को 99 वोट मिले। इससे मात्र 14 महीनों में ही कर्नाटक की सरकार गिर गई। 26 जुलाई 2019 को यददुरप्पा ने भाजपा समर्थित सरकार बनाई।

गोवा की राजनीति

2019 में भी कुछ ऐसा ही हुआ 40 सदस्यों वाली गोवा विधानसभा में 17 सीटें बीजेपी को मिली एवं 14 कांग्रेस को बाकी अन्य पार्टियों को। कांग्रेस ने अन्य पार्टियों के समर्थन से राज्यपाल को सरकार बने बनाने का आग्रह किया। परंतु अंतिम समय में कांग्रेस के 10 विधायकों के पार्टी छोड़ देने की वजह से गोआ में भी प्रमोद सावंत की बीजेपी सरकार का गठन हुआ।

निष्कर्ष

राजस्थान, मध्यप्रदेश, कर्नाटक एवं गोवा जैसी राजनीतिक उठापटक किसी भी राजनीतिक पार्टी को नफा नुकसान दे सकती है लेकिन वह लोकतंत्र और जनता को सिर्फ नुकसान देती है। जनता द्वारा चुनाव करके प्रत्याशियों का चुनाव किया जाता है वही जनता के प्रत्याशी कुछ निजी एवं स्वार्थी कारणों से अपनी पार्टी और आम जनता के साथ खिलवाड़ करते हैं।

अल्प संख्या वाली पार्टी का सरकार बनाना राज्यों में ही नहीं होता बल्कि यह केंद्रीय स्तर पर भी प्रधानमंत्री जैसे बहुप्रतिष्ठित पद के लिए भी कई बार हो चुका है। पिछली शताब्दी में कांग्रेस ने भी कई बार अपने सहयोग से सरकार बनवाई एवं कुछ समय पश्चात समर्थन वापस लेकर सरकार गिराने का काम भी किया। इसके कुछ उदाहरण है चौधरी चरण सिंह, वी पी सिंह, चंद्रशेखर, एच डी देवगौड़ा। सरकार की तरफ से दल बदल विरोधी कानून 1985 में संविधान संशोधन द्वारा लाया गया और इसे 10 वी अनुसूची में जोड़ा भी गया लेकिन इसके सार्थकता का परिणाम अभी बाकी है। 

दोस्तों आप इस घट्नाक्रम पर नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय दे सकते है। 

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