अकबर का इतिहास, क्या था अकबर एक महान बादशाह?

दोस्तों एक तरफ अकबर को महान बादशाह बताया जाता है वहीं दूसरी ओर उस पर कुछ एक आरोप भी लगाए जाते हैं। उसका हम आगे विश्लेषण करेंगे उससे पहले हम अकबर का इतिहास, अकबर बीरबल एवं अकबर के नवरत्न के बारे में जान लेते हैं।

अकबर का प्रारंभिक जीवन

अकबर का दादा अफगान शासक बाबर था। बाबर ने ही भारत में मुगल शासन की नींव रखी थी। अकबर के पिता का नाम हुमायूं और माता का नाम हमीदा बानो था। शेरशाह सूरी ने अकबर के पिता हुमायूं को 1539 में चौसा एवं 1540 में कन्नौज (बिलग्राम) के युद्ध में हरा दिया था। इस हार के बाद हुमायूं सिंध की तरफ कूच कर गया। इस दौरान उसने शेख अली अकबर जानी की पुत्री हमीदा बानो से निकाह कर लिया। मात्र 15 वर्ष की उम्र में हमीदा बानो ने अकबर को जन्म दिया।

अकबर का जन्म अमरकोट में राणा वीर साल के महल में 15 अक्टूबर 1542 को हुआ था। अकबर का पूरा नाम जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर था। इनका वंश तैमूर और मंगोल नेता चंगेज खां से संबंधित था। अर्थात उसके वंशज तैमूर लंग के खानदान से संबंधित थे और मातृ पक्ष चंगेज खां से संबंधित था।

बादशाह का बचपन शिकार एवं युद्ध कला में ही बिता और शिक्षा के नाम पर उसने कुछ भी हासिल नहीं किया। दोस्तों क्या आपको मालूम है कि अकबर बचपन में मरते- मरते बचा था जब हुमायूं और कामरान के बीच कंधार को लेकर युद्ध के दौरान हुमायूं की तोपें कंधार के किले पर आग बरसा रही थी उसी समय कामरान ने अकबर को किले की दीवार पर लटका दिया था परंतु सौभाग्य से वह बच गया।

1551 में बादशाह ने अपने चाचा हिन्दल मिर्जा की पुत्री की पुत्री रूकिया सुल्तान बेगम से निकाह कर लिया।

राज्याभिषेक

22 जून 1555 को हुमायूं ने कई संघर्षो के पश्चात अपने सिंहासन को पुनः प्राप्त कर लिया। जनवरी 1556 में हुमायूं की सीढ़ियों से गिरने से मृत्यु हो गई। इसके पश्चात अकबर का राज्याभिषेक बैरम खां की देखरेख में गुरदासपुर जिले के कालानौर नामक स्थान पर 14 फरवरी 1556 ईस्वी को मिर्जा अबुल कासिम द्वारा किया गया। इस प्रकार अकबर मुग़ल वंश का तीसरा शासक बना। बैरम खां हुमायूं के समय से ही अकबर के अंगरक्षक की भूमिका में था तथा 1556 से 1560 के मध्य संरक्षक की भूमिका में में भी रहा।

बैरम खां का पतन

बैरम खां के पतन में अकबर की धाय मां माहम अनगा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसने बैरम खां के खिलाफ अकबर को लगातार भड़का कर उससे रिश्ते खराब करने पर मजबूर कर दिया। आख़िरकार अकबर और बैरम खां के बीच तिलवाड़ा नामक स्थान पर युद्ध भी हुआ जिसमें अकबर की विजय हुई और बैरम खां ने समर्पण कर दिया।

एक दिन जब बैरम खां हज मक्का की यात्रा पर निकला हुआ था उसी वक्त 31 जनवरी 1561 को किसी विद्रोही द्वारा उसकी हत्या कर दी गई। बैरम खां की मृत्यु के पश्चात बादशाह ने उसकी विधवा पत्नी सलीमा बेगम से विवाह कर लिया।

दोस्तों अकबर के शासनकाल 1560-62 के समय को धाय महाम अनगा, उसके पुत्र आदम खान एवं पुत्री जीजीअनगा के शासन में सर्वे सर्वा होने के कारण इतिहासकारों ने “प्रदा शासन पेटीकोट सरकार” की संज्ञा दी है।

सैनिक अभियान एवं साम्राज्य विस्तार

मुगल बादशाह के राज्याभिषेक के समय मुगल राज बस काबुल से दिल्ली तक फैला हुआ था। शुरुआती कुछ वर्ष बैरम खां के नेतृत्व में रहे।राज्याभिषेक के कुछ समय के बाद ही 5 नवंबर 1556 को पानीपत का दूसरा युद्ध लड़ा गया उसमें अकबर की सेना ने बैरम खां के नेतृत्व में उत्तर भारत के विक्रमादित्य हेमू को पराजित किया।

साम्राज्य विस्तार के लिए मुग़ल बादशाह ने सर्वप्रथम आक्रमण 1561 में मालवा के शासक बाज बहादुर पर किया। इसी वर्ष मुगलों ने चुनार का किला भी फतह किया। इसके पश्चात अकबर ने राजपूताना आमेर को जीतने का प्रयास किया परंतु उससे पहले ही आमेर के राजा भारमल (बिहारीमल) ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली। भारमल ने अपनी पुत्री हरका बाई(जोधा बाई) का विवाह अकबर से करवा दिया, जो बाद में मरियम-उज-ज़मानी के नाम से प्रसिद्ध हुई। अकबर ने राजपूतों के सभी सिक्के हटवा कर अपने खुद के सिक्के चलवाये। उसने राजपूताना के लिए दमन  एवं शासन की नीति अपनाई।

सभी राजपूत राजाओं को अपने अधीन करने के पश्चात अकबर ने मेवाड़ जीतने के इरादे से 1567 में मेवाड़ के राजा उदय सिंह के विरुद्ध चित्तौड़गढ़ किले पर घेरा डाला। चित्तौड़गढ़ किले को मध्य राजस्थान का प्रवेश द्वार कहा जाता है। इस पर उदय सिंह के सामंतों की सलाह पर किले का भार जयमल एवं फत्ता को सौंपकर जंगलों में शरण ले ली। काफी मेहनत एवं प्रयासों के बाद मुगल सेना ने 25 फरवरी 1568 को चित्तौड़गढ़ किले को पूरी तरह से अपने काबू में ले लिया। जयमल एवं फत्ता वीरता लड़ते हुए वीरगती को प्राप्त हुए। इस प्रकार 1567 चित्तौड़गढ़ में राजस्थान का प्रसिद्ध तीसरा साका ( जोहर) हुआ।

आक्रोशित मुग़ल बादशाह ने किसानों, आम लोगों का कत्लेआम का हुक्म दिया। इसमें लगभग 20000 से 25000 लोग मारे गए। चाहे किला अकबर ने जीत लिया था परन्तु वह उदय सिंह को पकड़ने में नाकाम रहा। मुग़ल शासक इस युद्ध में जयमल फत्ता की वीरता से प्रभावित होकर इन दोनों वीरों की हाथी पर सवार प्रतिमा को आगरे के किले के मुख्य द्वार पर स्थापित किया। चित्तौड़गढ़ विजय के उपलक्ष में अकबर ने फतहनामा जारी किया।

गुजरात अभियान

गुजरात उस समय विश्व व्यापार का स्थल एवं प्रमुख केंद्र था। उसी की मंशा से बादशाह ने 1571 में गुजरात के मुजफ्फर खां तृतीय एवं 1572 में हुसैन मिर्जा को परास्त किया। इसी अभियान के दौरान मुगल बादशाह ने पहली बार समुद्र के दर्शन किए एवं पुर्तगालियों से भेंट की। गुजरात विजय के उपलक्ष में अकबर ने अपनी राजधानी में फतेहपुर सीकरी में बुलंद दरवाजा का निर्माण करवाया।

1571 में ही उसने अपनी राजधानी फतेहपुर सीकरी में स्थापित की।

मुग़ल बादशाह  ने 1576 में दाऊद खां को हराकर उत्तर भारत से अंतिम अफ़ग़ान शासक का खात्मा कर दिया।

हल्दीघाटी 1576 का युद्ध

दोस्तों अकबर ने कई बार मानसिंह, टोडरमल आदि को कई बार महाराणा प्रताप को अधीनता स्वीकार करने के लिए भेजा लेकिन उसे कभी भी सफलता नहीं मिली। हल्दीघाटी युद्ध का मुख्य कारण अकबर मेवाड़ की स्वतंत्रता समाप्त करना चाहता था और प्रताप मेवाड़ की रक्षा। इसमें मुगलों के आर्थिक एवं राजनीतिक स्वार्थ निहित थे अर्थात् मुगल व्यापार के लिए गंगा घाट को पश्चिमी घाट से जोड़ना चाहते थे और उन्हें ऐसा करने के लिए बीच रास्ते में पड़ने वाले मेवाड़ को जीतना आवश्यक था।

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अंत में 21 जून 1576 को हल्दीघाटी में प्रातः युद्ध प्रारंभ हुआ। इस युद्ध में प्रताप की तरफ से भील लोगों का सहयोग था जिसका नेतृत्व राणा पूंजा कर रहा था। महाराणा प्रताप की सेना की अगुवाई हकीम खान सूरी ने की थी और अकबर की सेना का नेतृत्व राजपूत शासक मानसिंह प्रथम कर रहा था। मुगल सेना राजपूत सेना की लगभग 5 गुना थी।

राजपूत सेना का पराक्रम देख मुगल सेना में मौजूद बदायूनी भाग खड़ा हुआ। मानसिंह भी महाराणा प्रताप के वार से मरते-मरते बचा। इस युद्ध का आखिर में कोई परिणाम नहीं निकला। इस युद्ध के दौरान प्रताप के घोड़े चेतक की मृत्यु हो गई। इस युद्ध के दौरान मुगल सेना भी रात को भीलो की लूट खसोट एवं घात प्रतिघात विधि से त्रस्त हो गई और इससे अगली सुबह मानसिंह भी अपनी बची कुची सेना के साथ गोगुंदा की तरफ कूच कर गया। इस प्रकार मेवाड़ को अधीन करने का अकबर का प्रयास निरर्थक साबित हुआ। हल्दीघाटी युद्ध को खमनौर के युद्ध के नाम से भी जाना जाता है।

दक्षिणी विजय

अकबर का दक्षिणी भारत जीतने का मुख्य मकसद अपनी साम्राज्यवादी नीति थी। उसने दक्षिण में अहमदनगर, असीरगढ़ एवं खाना देश खानदेश को जीत लिया। खानदेश दक्षिण का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है। 1601 में अकबर ने अपने अंतिम आक्रमण में असीरगढ़ के वीर बहादुर को हराया यह विजय उसकी अंतिम विजय थी।

अकबर के नवरत्न

  1. अबुल फजल–  इन्होंने अकबर काल के अकबरनामा एवं आईन-ए-अकबरी की रचना की।
  2. फैजी– यह अबुल फजल का भाई था। यह गणितज्ञ एवं फारसी कविता करने वाले विद्वान थे।
  3. तानसेन– यह दरबार में गायक थे।
  4. बीरबल– अकबर के सलाहकार थे एवं परम बुद्धिमान थे। आज भी अकबर-बीरबल के किस्से लोगों की जुबान पर है।बीरबल की मृत्यु 1586 में अफगान बलूचियों के विद्रोह के दौरान हुई थी।
  5. राजा टोडरमल– ये अकबर के वित्त मंत्री थे।
  6. मानसिंह– मानसिंह आमेर के कछवाहा राजपूत राजा थे। ये बादशाह के प्रधान सेनापति थे। जोधाबाई इनकी बुआ थी।
  7. अब्दुल रहीम खान-ए-खाना– बैरम खां केपुत्र थे एवं दरबार में कवि थे।
  8. फकीर अजिओं– सलाहकार।
  9. मुला दो पीयाजा– सलाहकार।

सुधार एवं कुछ अन्य कार्य

अकबर ने समाज सुधार के लिए अनेक कार्य किए। उसने सर्वप्रथम 1562 में दास प्रथा का अंत किया। उसके अगले वर्ष 1563 में तीर्थ यात्रा कर को हटा दिया। 1564 में गैर मुस्लिम जनता से वसूल किए जाने वाले जजिया कर को समाप्त कर दिया। उसने 1582 में सभी धर्मों में सामंजस्य स्थापित करने के लिए एक नया धर्म “दीन- ए-इलाही” बनाया। अकबर ने 1583 में इलाही संवत” नाम से अपना एक नया कैलेंडर जारी किया।

बादशाह ने सती प्रथा पर रोक लगाने का प्रयास किया और विधवा विवाह को भी प्रोत्साहित किया। उसने लड़कों के विवाह की न्यूनतम उम्र 16 वर्ष एवं लड़कियों की उम्र 14 वर्ष निर्धारित की। अकबर ने 1575 में फतेहपुर सीकरी में इबादत खाना की स्थापना भी की। बाद में 1578 में इसे धर्म संसद में परिवर्तित कर दिया गया।

अकबर का आकलन

दोस्तों अकबर के प्रारंभिक जीवन की बात की जाए तो वह काफी संघर्षपूर्ण रहा। उसके बचपन में मां और बाप दोनों का साया नहीं था फिर भी उसने मात्र 14 वर्ष की उम्र में राज्य का शासन अपने हाथों में लेकर राज्य का चहुंमुखी विस्तार करने  में जुट गया। चतुर एवं दूरदर्शी अकबर को मालूम था कि उसे अगर अपना साम्राज्य विस्तार करना है तो राजपूताना एवं गुजरात को अपनी तरफ करना होगा। आमेर के राजा भारमल ने तो बिना लड़ाई अधीनता स्वीकार कर ली। बादशाह ने राजपूत राजाओं के साथ मैैत्री एवं वैवाहिक संबंध(बीकानेर, जैसलमेर) स्थापित करके उनको अपने पक्ष में ले लिया बाद में उसने गुजरात भी जीत लिया।

बादशाह को मालूम था कि भारत के ऊपर हमेशा आक्रमण कांधार, बलूचिस्तान, काबुल, अफ़गानिस्तान में होते रहते हैं। इसलिए उसने इन क्षेत्रों को मजबूत किया और वहां अपनी सशक्त सेना तैयार की।

इस मुग़ल बादशाह ने सभी धर्मों को आदर दिया, अपने दुश्मनों को अपना मित्र बनाया, वैवाहिक संबंध स्थापित किये।  इससे वो समस्त भारत में लोकप्रिय हो गया और अपना विशाल साम्राज्य बनाया।

दोस्तों इस मुग़ल बादशाह ने जहां एक और समाज में सुधार के लिए निरंतर प्रयास किए और अपनी अलग छवि बनाई दूसरी तरफ उसके ऊपर कुछ अमिट दब्बे भी लगे हैं।

1567 में अकबर ने चित्तौड़गढ़ युद्ध में 20,000 से 25,000 निर्दोष लोगों का कत्लेआम करवाया जो किसी भी बादशाह से अपेक्षित नहीं था। बादशाह के ऊपर हरम के लिए सुंदर स्त्रियों का चुनाव करने के लिए भी आरोप हैं।

अकबर की मृत्यु

अकबर का पुत्र सलीम (जहांगीर) था जो कि जोधा बाई की कोख से पैदा हुआ था। वह भी कुछ समय से अपने हाथों में शासन लेने की कोशिश कर रहा था परंतु कुछ समय के पश्चात ही 27 अक्टूबर 1605 को पेचिश से परेशान होकर अकबर की मृत्यु 63 वर्ष की उम्र में हो गई। अकबर का मकबरा सिकंदरा(आगरा) में स्थित हैं।

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धन्यवाद्।

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